स्वच्छ भारत के लिए स्वच्छ मानसिकता जरूरी

»  किसी भी जगह का रख-रखाव यदि अच्छी तरह हो रहा हो तो सफाई का स्तर उसका पहला संकेत होता है। फिर चाहे वह रेस्तरां, होटल, एयरपोर्ट, कोई ऑफिस या रेलवे स्टेशन ही क्यों न हो। यदि साफ-सफाई नहीं है तो किसी के प्रभावित होने की संभावना नहीं होती। यही बात पूरे देश पर लागू होती है।

 
»  यदि हम चाहते हैं कि देश अपनी पूरी क्षमता के अनुसार दुनिया में प्रदर्शन करे तो हमें इसे स्वच्छ बनाना होगा। लोग चाहे कितने ही प्रतिभाशाली क्यों न हों और प्राकृतिक संसाधन कितने ही अद्भुत क्यों न हों, यदि चारों ओर गंदगी है तो इसे कभी वह सम्मान नहीं मिलेगा, जिसका वह हकदार है।
 
»  हाथ में झाड़ू लिए फोटो खिंचवाना बहुत आकर्षक लगता है और इसका उद्देश्य भी अच्छा है, 
यदि हम वाकई इस बारे में गंभीर हैं तो सबसे पहले यह जानना होगा कि हम गंदे क्यों हैं और अधिक स्वच्छ भारत के लिए क्या करना होगा। हम गंदे लोग नहीं हैं। भारतीय अपने घरों को स्वच्छ रखने में बहुत सावधानी बरतते हैं।
 
»  देश के कई हिस्सों में तो लोग घरों में जूते पहनकर नहीं जाते। चप्पल-जूते बाहर ही छोड़ दिए जाते हैं ताकि घर के भीतर गंदगी न पहुंचे, वह साफ-सुथरा रहे। हमारे कुछ धर्म-स्थल बहुत स्वच्छ रखे जाते हैं। हमारा सबसे बड़ा त्योहार दीपावली तो स्वच्छता से ही जुड़ा है। दीपावली आते ही हर कोई सबकुछ चकाचक करने के लिए उठ खड़ा होता है। भारतीय रोज नहाने पर बहुत जोर देते हैं। यह ऐसी बात है, जो पश्चिम में उतनी आम नहीं है।
 
फिर हमारा देश गंदा क्यों है? ऐसा क्यों है कि जब हम अपने घरों के बाहर कदम रखते हैं, कुछ ही मीटर बाद सड़कों के किनारे ढेर सारा कचरा पड़ा मिलता है? क्या नगर निगम व पालिकाएं साफ-सफाई का अपना काम नहीं कर रही हैं? क्या यह स्थानीय नेता का काम है कि वह चारों ओर साफ-सफाई सुनिश्चित करे? क्या हमारे यहां पर्याप्त कूड़ेदान नहीं हैं?
 
»  इनमें से कोई भी बात भारत के अस्वच्छ रहने का कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं करती। हम इतने अस्वच्छ क्यों हैं, इसका सबसे पहला कारण तो यही है कि हम गंदी फैलाते हैं। यदि हम वाकई देश साफ-सुथरा बनाना चाहते हैं, तो हमें ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे कम से कम कचरा पैदा हो। बजाय इसके कि हम यह उम्मीद करें कि कोई झाड़ू उठाकर उसे साफ करेगा। पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विकसित देशों में स्थानीय संस्थाएं हमेशा साफ-सफाई में नहीं लगी रहतीं। वहां साफ-सफाई की एक व्यवस्था है और स्थानीय नागरिक इसमें पूरा सहयोग देते हैं। पहली बात तो यह है कि वह कचरा पैदा ही नहीं करते।
 
»  एक हम हैं कि देश को अपने घर की तुलना में अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। हम अपने घर में तो चीजें एकदम साफ-सुथरी चाहते हैं, लेकिन घर के प्रवेश द्वार के बाहर की सफाई से हमें कोई मतलब नहीं होता, क्योंकि वह जगह हमारी नहीं है। हम सोचते हैं, वैसे भी गलियों में गंदगी ही गंदगी है और मैं यदि थोड़ा और कचरा डाल दूं तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
 
»  यदि हमारी यही मानसिकता रही तो चाहे आप नगर निगम कर्मचारियों की पूरी सेना सातों दिन-चौबीसों घंटे सफाई में लगा दें, सैकड़ों सेलेब्रिटी सड़कें साफ करने में लग जाएं और प्रधानमंत्री दर्जनों भाषण दे दें, मैं आपको यकीन दिला सकता हूं कि भारत कभी स्वच्छ नहीं होगा। देश को स्वच्छ करने का एक ही तरीका है कि पहले तो हमें कचरा न्यूनतम रखना होगा। उसे पैदा करने से बचना होगा और ऐसा तभी हो सकता है जब हम सब यह सोचने लगें कि ‘मेरे घर के बाहर जो है, वह भी मेरा ही है।’ सामुदायिकता का यह बोध, वृहत्तर अच्छाई और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना ही एकमात्र तरीका है, जिससे हम परिस्थिति बदलने की उम्मीद कर सकते हैं। अन्यथा इस स्वच्छता अभियान का भी वही हश्र होगा, जो ऐसे सामाजिक सोदेश्यता वाले अन्य अभियानों का हुआ है। यह अभियान भी अपनी नवीनता खोने के बाद भुला दिया जाएगा।
 
»  बेशक, आधारभूत ढांचे में सुधार की भी जरूरत है जैसे ठोस कचरे, औद्योगिक और कृषि से उत्पन्न होने वाले कचरे के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की जरूरत है। फिर चाहे स्वच्छता का स्तर हो या किसी क्षेत्र विशेष में कूड़ेदानों की संख्या आदि के लिए नए मानक स्थापित करने होंगे। कानून और जुर्माने की भी अपनी जगह है। बेशक, ये सब सरकार के काम हैं और इसी के आधार पर उसका आकलन होगा। हालांकि, यदि हम भारतीय घर और बाहर को अलग समझने की अपनी मानसिकता नहीं बदलते तो इन सारी चीजों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। यह देश आपका है। यह तो स्पष्ट है कि आप अकेले सारी सफाई नहीं कर सकते। हां, आप अपने आस-पास के क्षेत्र को लेकर थोड़ी अधिक जागरूकता जरूर दिखा सकते हैं।
 
»  जब सामूहिक जिम्मेदारी का बोध होगा तो साफ-सफाई का स्तर निश्चित ही बहुत ऊंचा होगा। यही वजह है कि ज्यादातर कॉलेज कैंपस बाहर के शहर की तुलना में ज्यादा साफ होते हैं जबकि भीतर हजारों युवा रहते हैं।एक स्वच्छ भारत मुमकिन है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पहला कदम है ‘स्वच्छ मानसिकता’।
 
???? क्या आप तैयार हैं????
 

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