टेक्सोबैक्टिन की खोज:एंटीबायोटिक के क्षेत्र में कालजयी सफलता

टेक्सोबैक्टिन की खोज:एंटीबायोटिक के क्षेत्र में कालजयी सफलता

 अनूठे गुणों वाले एक नये एंटीबायोटिक की खोज ने दवाओं से निजात पाने की अंतहीन लड़ाई में नया मोड़ ला दिया है। टेक्सोबैक्टिन की खोज की हालिया घोषणा ने यह उम्मीद जगा दी है कि जल्दी ही हमारे पास ऐसी एंटीबायोटिक दवा होंगी जिनका प्रतिरोध जल्दी तैयार न हो सकेगा।


 पिछले 32 सालों से किसी नए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल दवा बनाने में नहीं किया गया है। हालांकि इस अवधि में नए एंटीबायोटिक खोजे जरूर गए हैं लेकिन उनसे दवा बनाने की बहुत अधिक संभावना मौजूद नहीं थी। उस वक्त कई जीवाणुओं ने दवाओं से प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली थी। इस वजह से टीबी और न्यूमोनिया जैसी बीमारियां नए सिरे से सर उठाने लगीं जिन पर दवाओं का असर नहीं होता था। तथाकथित दिल्ली सुपरबग भी इस दौरान सामने आया।


अनुमान के मुताबिक दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर चुके ये सुपरबग हर वर्ष 700,000 लोगों की जान ले लेते हैं। टेक्सोबैक्टिन नामक यह नया एंटीबायोटिक दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर चुके सुपरबग से निपटने में सक्षम है ऐसा चूहों पर किए गए चिकित्सकीय परीक्षणों से साबित हो चुका है। इतना ही नहीं यह जीवाणुओं में प्रतिरोध के कोई चिह्न नहीं छोड़ता। इसलिए अनुमान है कि लंबे समय तक इसका प्रतिरोध विकसित कर पाना मुश्किल बना रहेगा


इतना ही नहीं टैक्सोबैक्टिन को एक नए तरीके से विकसित किया गया। ऐसे में उम्मीद पैदा हुई है कि इस तरीके का इस्तेमाल करके और अधिक संख्या में नई प्रतिरोधी एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की जा सकती हैं। हालांकि अभी शुरुआत है और टैक्सोबैक्टिन के इंसान पर परीक्षण में करीब दो साल का समय लग सकता है। अगर सबकुछ ठीकठाक रहा तो करीब पांच साल में यह दवा बाजार में आ जाएगी। जाहिर है यह खोज सुपरबग्स के खिलाफ नई दवाओं का मार्ग प्रशस्त करती है। यह ऐसे समय में हुआ है जब लोगों को लग रहा था कि यह काम मुश्किल हो सकता है।


पेंसिलीन की खोज सन 1928 में ब्रेड में खराबी से अचानक हुई थी। लेकिन प्राकृतिक तौर पर बनने वाले कुछ ही एंटीबायोटिक ऐसे होते हैं जिनको प्रयोगशाला में तैयार किया जा सकता है। इनमें से कई के बहुत खतरनाक दुष्प्रभाव भी होते हैं। इस टीम ने इनको तैयार करने के लिए नया तरीका अपनाया और इनकी गंदगी में लगभग प्राकृतिक स्थितियों में तैयार किया। इसके लिए उन्होंने आईसोलेशन चिप (आईचिप) नामक उपकरण तैयार किया जो एंटीबायोटिक की एक कोशिका को अलग करके उसका विकास करती है। उन्होंने अब तक 25 नए एंटीबायोटिक तलाश किए हैं जिनमें टेक्सोबैक्टिन सर्वाधिक उम्मीद जगाता है। इसे एलेफ्थेरिया टेराए नामक जीवाणु से बनाया गया है जो घास के मैदान में मिला था। टेक्सोबैक्टिन में कई रोग प्रतिरोधी जीवाणुओं को मारने की क्षमता देखी गई।


विभिन्न भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों में इसका परीक्षण करना होगा ताकि दवा निर्माण में इसकी अनुकूलता का आकलन किया जा सके। अगर ये कारगर साबित होती हैं तो यह सुनिश्चित करना होगा कि जीवाणु नए सिरे से प्रतिरोध न विकसित कर लें। इन चेतावनियों के बावजूद इसे एक बड़ी खोज माना जा सकता है जो दवा शोध के हालात बदल देगी।
 

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