नदियों ने संस्कृतियों को जन्मा और संस्कृतियों ने नदियों को मौत दी

नदियों ने संस्कृतियों को जन्मा और संस्कृतियों ने नदियों को मौत दी

 

»  इसे अपनी संस्कृति की परंपरा कह सकते हैं या आस्था कि हमारे यहां मेले या शुभ उत्सव नदियों के तट पर, उनके संगम या धर्मस्थलों पर लगते हैं। कुंभ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


»  अपनी मान्यता के कारण लाखों-करोड़ों लोग आकर स्नान करते हैं। फूल, अगरबत्ती, बाती, दोना आदि का दान कर पुण्य कमाने की लालसा में उस नदी के जीवन के बारे में कुछ नहीं सोचते। त्योहारों पर तो विशेषतः मूर्ति-विसर्जन करके टनों की गंदगी फैला देते हैं। यह विचारणीय है। पहले मिट्टी की मूर्तियां जल में आसानी से घुल जाती थीं, पर अब तो मूर्तियां भी ऐसे पदार्थों से बनतीं हैं, जिसमंे प्लास्टिक की ज्यादा मात्रा होती है जो अघुलनशील है। साथ में बैटरी, दवाओं के रैपर्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि का बहाव भीषण हानिकारक होता है।


»  उत्तराखंड से पश्चिम बंगाल तक गंगा तट पर अनगिनत छोटे-बड़े कारखाने स्थित हैं। नदियों के किनारे बसे शहरों का तेजी से विकास हुआ है, पर बदले में नदियों की आयु बढ़ाने के कोई उपाय नहीं किए गए। कारखानों से निकला कचरा इन नदियों में बहाकर पानी को अत्यंत विषैला बना दिया गया है। जिस गंगा जल के लिए माना जाता है कि वह कभी मैला नहीं होता, वह अपनी इस विरासत को खो चुका है। गंगा जल का प्रयोग जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न संस्कारों में किया जाता है, चाहे जन्म के समय सूतक से मुक्त करना हो, चाहे मृत्यु के बाद आखिरी पथ्य के रूप में डाला जाना हो, इसका कोई विकल्प नहीं है।


»  लेकिन आज वह पवित्र जल अपनी अस्मिता बचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश भर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70% गंदा पानी बिना शोधन के उन नदियों में छोड़ दिया जाता है, जहां से पीने का पानी लिया जाता है। शहरों की सिवेज व्यवस्था ऐसी है कि घरों के टॉयलेट से निकला पानी नालियों के द्वारा नदियों से मिल जाता है। करीबन अस्सी प्रतिशत जल प्रदूषण सिवरेज द्वारा ही होता है। वाटर ट्रीटमेंट विभाग द्वारा थोड़ी सफाई की भी जाती है तो प्रदूषण के प्रतिशत को देखते हुए यह नाम मात्र है। यह एक महंगी प्रक्रिया है।


»  विकल्प तो यह होना चाहिए कि किसी कस्बे के ऐसे गंदे पानी को वहीं सिवेज नियंत्रण बोर्ड द्वारा जांच कर लेनी चाहिए कि उसमें से कितना सिंचाई हेतु स्वच्छ जल निकल पाएगा, कितना खाद अलग हो सकता है या फिर जल इतना विषाक्त हो चुका है कि वह किसी काम लायक नहीं है तो फिर उसे कैसे उसी औद्योगिक क्षेत्र के अंदर खपा कर नष्ट कर दिया जाए। पानी की जितनी साइकिलिंग संभव है, की जाए। नदियां असंख्य लोगों की जीविका का आधार हैं। इसे बचाए रखने के लिए इन गंदगियों को रोकना ही होगा।


»  गंगा और अन्य नदियों में प्रदूषण के अलावा एक और समस्या उन पर बांध बना कर उनके निर्बाध बहाव में अवरोध पैदा करना है। बिजली उत्पादन के लिए बांध बनाना आवश्यक है। विकास के लिए नदियों का दोहन एक सस्ती प्रक्रिया है, पर उसके गति और प्रवाह को बनाए रखने का विकल्प भी सोचना चाहिए।


»  भारत के 29 शहरों से होकर बहने वाली गंगा जिस भव्य आर्थिक पृष्ठभूमि की रचना करती है और अपने साथ जुड़ी धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व का बोध कराती है वह विकास की अंधी दौड़ में धूमिल न पड़ जाए इसका ध्यान रखना होगा।
 

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