जैवविविधता से समृद्ध पश्चिमी घाट (साभार निर्माण नोट्स)

जैवविविधता से समृद्ध पश्चिमी घाट" (IMP Topic) (साभार: निर्माण नोट्स)

»  पश्चिमी घाट महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर ताप्ती नदी से शुरू होकर देश के धुर दक्षिणी सिरे, तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक फैले हुए हैं । लगभग 1600 किलोमीटर की इस लम्बाई में 6 राज्यों--तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात (दोनों वन क्षेत्र का भाग), के तटवर्ती इलाके शामिल हैं । घाट का कुल क्षेत्रफल करीब 1.60 लाख वर्ग किलोमीटर है ।


»  पश्चिमी घाट वर्षा बहुल क्षेत्र है । प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट से ही होता है । इनमें से गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, काली नदी और पेरियार प्रमुख हैं, जो अन्तप्र्रांतीय महत्त्व की हैं । इन नदियों के जल का उपयोग सिंचाई और विद्युत उत्पादन के लिये किया जाता है ।


पश्चिमी घाट की जैवविविधता:-
हॉट स्पॉट
»  पश्चिमी घाट की गिनती विश्व के जैवविविधता के उन चार प्रमुख केन्द्रों में होती है जिन्हें हॉट स्पॉट के रूप में जाना जाता है । जैवविविधता वाला हॉट स्पॉट उस जैव भौगालिक क्षेत्र को कहते हैं जहां विविध प्रकार के जीवों का भारी भंडार होता है परन्तु जो नष्टप्राय: हैं । विविध प्रकार के भौगोलिक, जलवायु संबंधी और भू-वैज्ञानिक कारकों के योगदान से जैवविविधता का भंडार सम्पन्न हाता है ।


»  इस क्षेत्र का लगभग 30 प्रतिशत भाग वनाच्छादित है । इसमें उष्णकटिबंधीय नमी वाले सदाबहार वन और नमी वाले पतझड़ी वन शामिल हैं । पश्चिमी घाट के ऊपरी हिस्से में पाया जाने वाला घास का प्राकृतिक मैदान-शोला इस क्षेत्र की बेजोड़ विशेषता है ।
»  इस क्षेत्र में पायी जाने वाली स्थानिक प्रजातियों का प्रतिशत काफी अधिक है । जल-थल दोनों में जीवित रहने वाले देश के सभी उभयचर जीवों का 78 प्रतिशत, 62 प्रतिशत सर्पश्रेणी के जीव, एन्जियोस्पर्म जीवों के 38 प्रतिशत, 53 प्रतिशत मछलियों और स्तनपायी जीवों में से 12 प्रतिशत सिर्फ पश्चिमी घाट में पाए जाते हैं।


»  पश्चिमी घाट क्षेत्र एक ऐसा इलाका है जहां पौधों को उगाने का काम विश्व में सबसे अधिक होता है । बागानों की बहुतायत है । पारम्परिक रूप से इस क्षेत्र के पहाड़ी भाग में सुपारी, कालीमिर्च और इलायची की खेती होती है, जबकि तटीय क्षेत्र में नारियल के साथ-साथ आम और कटहल की फसल ली जाती है । इस क्षेत्र की अन्य महत्त्वपूर्ण फसलों में चाय, कॉफी, रबड़, काजू और टेपिओका शामिल हैं ।


»  पश्चिमी घाट क्षेत्र की जैवविविधता के संरक्षण के लिये सरकार ने कार्य योजना तैयार की। इस कार्य योजना में उन खतरों और दबावों का उल्लेख किया गया है जो जैवविविधता के संरक्षण के मार्ग में बाधक बने हुए हैं । देश में जैवविविधता के संरक्षण के लिये किये जाने वाले कार्यों का विवरण भी इस कार्य योजना में दिया गया है ।


प्रमुख पारिस्थितिकीय समस्यायें:- क्षेत्र की प्रमुख पारिस्थितिकीय समस्याओं में जनसंख्या और उद्योगों का दबाव शामिल हैं । इसके पर्यटन से भी इस क्षेत्र पर यहां की वनस्पति पर दबाव बढा है । नदी घाटी परियोजनाओं के अंतर्गत वन भमि का डूब क्षेत्र में आना, वन भूमि पर अतिक्रमण, खनिकर्म, चाय, काफी, रबड़, यूक्लिप्टस, आदि एक फसली बागान, रेल और सड़क जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनायें, भू-क्षरण, भू-स्खलन आदि ऐसे अनेक कारण हैं, जिनसे पश्चिमी घाट की जैवविविधता प्रभावित हुई है ।


"पश्चिमी घाट में जीवमंडल और राष्ट्रीय उद्यान :-
तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल राज्यों में फैला करीब 5520 वर्ग किलोमीटर का नीलगिरि जीवमंडल संरक्षित क्षेत्र देश का पहला संरक्षित जीवमंडल है । जहाँ पर्या-प्रणाली के संरक्षण, अनुसंधान, निगरानी और संपोषणीय विकास के कार्य किये जाते हैं।


»  इसके अतिरिक्त, पश्चिमी घाट का 10 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र (लगभग 13,000 वर्ग किलोमीटर) कानूनी रूप से निर्दिष्ट संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत आता है । इस क्षेत्र के कुछ महत्त्वपूर्ण और प्रसिध्द राष्ट्रीय उद्यानों में नगरहोल, बांदीपुर, पेरियार और अन्नामलाइ की गिनती होती है । सरकार पूर्वी और पश्चिमी घाट अनुसंधान कार्यक्रम भी इसी क्षेत्र में चलाती है।


जैवविविधता पर राष्ट्रीय कार्य योजना
सरकार ने राष्ट्रीय जैवविविधता कार्य योजना (एनएबीपी) तैयार की। इस योजना में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के प्रमुख सिध्दांतों की व्याख्या की गई है । नीति के तहत संपोषणीय विकास के सरोकारों में मानव मात्र को केन्द्र में रखा गया है, जिसे प्रकृति के सहचर्य में स्वास्थ्य और उपयोगी जीवन जीने का अधिकार है ।


»  एनवीएपी का दस्तावेज मुख्य रूप से वर्तमान कानूनों के मूल्यांकन, क्षेत्रानुसार नीतियों, नियामक प्रणालियों, क्रियान्वयन व्यवस्थाओं, वर्तमान रणनीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों पर आधारित है ।


»  इसमें जैव विविधता के संरक्षण और स्थायी उपयोग की वर्तमान और भावी आवश्यकताओं के आकलन पर आधारित कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने की पेशकश की गई है । इन उद्देश्यों की पूर्ति के भौतिक और वित्तीय साधनों का भी उल्लेख किया गया है ।
 

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