पर्यावरण संकट और उसके दुष्प्रभाव

पर्यावरण संकट और उसके दुष्प्रभाव- पर्यावरण को निर्मित और प्रभावित करने वाले सभी पक्षों से इसको जो नुकसान हो रहा है वह हमारी सभ्यता के लिए भयावह संकट के रूप में उत्पन्न हो रहा है:


वायु प्रदूषण- करीब तीन अरब लोग कोयले और ठोस ईंधन के इस्तेमाल से खाना पका और गर्मा रहे हैं। इससे उत्पन्न होने वाले इंडोर वायु प्रदूषण के कारण करीब 20 लाख लोग असामयिक मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। शहरी आउटडोर वायु प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर पर हर साल करीब 13 लाख लोगों की मौत होती है।


जलवायु परिवर्तन- दीर्घकालिक अवधि में मौसम समेत पर्यावरण में आने वाले बदलावों को जलवायु परिवर्तन कहा जाता है। यह मानव के कारण ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, ओजोन का क्षरण आदि के रूप में दिखाई दे रहा है।


जैव विविधता- विज्ञान के मुताबिक पृथ्वी पर प्रजातियों की वास्तविक संख्या करीब 1.75 मिलियन है। यद्यपि कन्वेंशन ऑन बॉयोलाजिकल डायर्विसिटी (सीबीडी) ने इसका आकलन करीब 13 मिलियन प्रजातियों के आस-पास किया है। दिसंबर, 2010 के एक अध्ययन के मुताबिक जैव विविधता के घटने से मनुष्यों में संक्रामक रोगों के बढऩे का खतरा बढ़ता जा रहा है। दरअसल इनकी रक्षा करने वाली 'बफर प्रजातियां' नष्ट हो रही हैं और मनुष्य उनके नए शिकार बनते जा रहे हैं।


कोरल रीफ- ये सागर की सतह का महज 0.2 प्रतिशत बनाती हैं लेकिन 25 प्रतिशत समुद्री जीवन का निर्माण करती हैं। ये भोजन का स्रोत हैं और विशेष रूप से विकासशील देशों में कई लोगों के जीवन का आधार हैं। दरअसल कैंसर रोधी और दर्द निवारक दवाओं का निर्माण कोरल रीफ से होता है। इन तथ्यों के बावजूद बढ़ते प्रदूषण के कारण विशेषज्ञों के अनुसार करीब 10 प्रतिशत कोरल रीफ नष्ट हो चुकी हैं। अन्य करीब 60 प्रतिशत खतरे में हैं।


मरुस्थलीकरण- अंटार्कटिका को छोड़कर सभी महाद्वीपों पर मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया चालू है। विश्व के कुल भू-क्षेत्रफल पर 41 प्रतिशत शुष्क भूमि है। इस भूमि पर करीब दो अरब लोग निवास करते हैं। इस शुष्क भूमि के मरुस्थल में बदलने का सबसे बड़ा खतरा है। माना जाता है कि 10-20 प्रतिशत शुष्क भूमि का क्षरण हो चुका है। बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए पांच मिलियन वर्ग किमी घास के पूर्व मैदानों पर अब फसलें उगाई जा रही हैं। ये इस तरह की फसलों का बड़ा हिस्सा है जितना किसान बिना सिंचाई के उगा रहा है और सूखा जैसे कारणों से फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। वैश्विक स्तर पर इस तरह की हर साल दो मिलियन वर्ग किमी वर्षा बाधित कृषि योग्य भूमि का क्षरण हो रहा है और एक प्रतिशत को मरुस्थल बनने के लिए छोड़ दिया जा रहा है।


खतरे में प्रजातियां-- प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल 'नेचर' के मुताबिक अगले 50 वर्षों में विश्व के 25 प्रतिशत भू-जीव प्राकृतिक आवासों के क्षरण के कारण विलुप्त हो जाएंगे।


पारिस्थितिकी तंत्र- डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और नेशनल जियोग्राफिक ने दुनिया को 867 पारिस्थितिकी क्षेत्रों की श्रेणी में विभाजित किया है। इनमें से 35 क्षेत्र खतरे में हैं।
 

Back to Top