भारत में आर्थिक असमानता & विश्व बैंक की रिपोर्ट"

भारत में आर्थिक असमानता & विश्व बैंक की रिपोर्ट"

»  विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया में असमानता संबंधी अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में आय और अरबपतियों के अनुपात में विषमता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश की संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी भी असंगत है। इन अरबपतियों में से ज्यादातर (करीब 50-60) ने अपनी संपत्ति अपने प्रबंधन वाली कंपनियों में शेयरों के रूप में रखी है। जैसे-जैसे इन शेयरों की कीमतें ऊपर-नीचे होती हैं वैसे-वैसे इन अरबपतियों की संपत्ति भी बढ़ती-घटती रहती है।


»  कल्पना कीजिए कि अगर सरकार संस्थागत विदेशी निवेशकों (एफआईआई) के शेयर बाजार में कारोबार करने पर प्रतिबंध लगा दे तो क्या होगा? या फिर अगर एफआईआई किन्हीं वजहों से भारत से मुंह मोड़ लें तो क्या होगा? चूंकि एफआईआई लंबे समय से भारतीय बाजार को चलाने वाली शक्ति रहे हैं, ऐसे में शेयर बाजार उनके थोक में बाहर जाने पर औंधे मुंह गिर सकते हैं। जाहिर है शेयर कीमतों में भी आधे से लेकर दो तिहाई तक की गिरावट आएगी। वर्ष 2008-09 में भी यही हुआ था। उस वक्त उत्तरी अमेरिकी वित्तीय संकट ने एफआईआई को अपना पैसा निकालने पर मजबूर किया था। शेयर बाजार 14 महीनों में ही 21,000 से गिरकर 8,000 पर आ गया था। इस बात ने अनेक अरबपतियों को करोड़पति बना दिया और स्वाभाविक तौर पर संपत्ति की असमानता को कम किया।


»  अगर भारत में आज पहले के मुकाबले ज्यादा अरबपति हैं (15 साल पहले देश में 4 अरबपति थे) तो ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में एफआईआई की रुचि बढ़ी है। चूंकि वे शेयर खरीदते हैं इसलिए उनकी कीमत बढ़ती है। सभी सूचीबद्घ कंपनियों का बाजार मूल्य अब जीडीपी के 40 फीसदी से बढ़कर जीडीपी के 80 फीसदी तक हो चुका है। जाहिर सी बात है इसका सबसे ज्यादा फायदा उन शेयर के मालिकों यानी कंपनियों के प्रवर्तकों को मिलता है। सवाल यह उठता है कि दक्षिण एशिया के अन्य मुल्कों में इतने अरबपति क्यों नहीं हैं? इसका जवाब आसान है: उनकी कंपनियां और अर्थव्यवस्था एफआईआई को इतना आकर्षित नहीं करतीं जितना भारत की।


»  पाकिस्तान के बाजार पूंजीकरण और जीडीपी का अनुपात महज 25 फीसदी है। चीन की बात करें तो वहां की अधिकांश बड़ी कंपनियां सरकारी हैं। भारत में उद्यमी सबसे आगे हैं। निश्चित तौर पर उनमें से कुछ ने उन क्षेत्रों में मौजूद अवसरों का भी लाभ लिया होगा जहां सरकार का गहरा नियंत्रण है। यह बात उनके संपत्ति निर्माण के तौरतरीकों के बारे में कुछ कहती है। लेकिन ऐसे लोग कम हैं। चाहे जो भी हो सरकार को जीवन बीमा निगम जैसी कंपनियों को सूचीबद्घ करना होगाI


»  यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि क्रेडिट सुइस की सालाना संपदा रिपोर्ट के मुताबिक देश की 85 फीसदी संपत्ति भूमि जैसे भौतिक स्वरूप में है। केवल 15 प्रतिशत संपत्ति ही वित्तीय स्वरूप में है, उसमें से भी अधिकांश राशि बैंक जमा के रूप में है। अमीर देशों में ऐसा नहंी है। वहां आधी संपत्ति वित्तीय स्वरूप में रहती है। अगर आप भारत के अरबपतियों की संपत्ति पर नजर डालें तों आपको पता चलेगा कि यह 15 फीसदी का एक छोटा हिस्सा है। अगर आप क्रेडिट सुइस के नजरिये से देखें तो देश में संपत्ति की असमानता अन्य देशों की तुलना में काफी कम है।


»  इसके बावजूद इससे निपटने का एक एजेंडा होना चाहिए। देश में संपत्ति पर लगने वाले कर में दो बड़े अंतर हैं। संपदा शुल्क (जिसे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने हटाया) को दोबारा लागू किया जाना चाहिए।


»  इसी तरह शेयरों से लंबी अवधि में होने वाले पूंजीगत लाभ पर भी कर (जिसे पी चिदंबरम ने हटाया था) भी दोबारा लगाया जाना चाहिए।
 

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