देश में मौजूदा संस्थान और उनकी कार्यप्रणाली

देश में मौजूदा संस्थान और उनकी कार्यप्रणाली

देश के संस्थानों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: संवैधानिक, सांविधिक और अस्थिर प्रकृति के संस्थान। इस तीसरी श्रेणी में योजना आयोग जैसे संस्थान आते हैं जिसका नाम अब बदलकर नीति आयोग रख दिया गया है।


देश में संविधान के जरिये जिन संस्थानों का गठन किया गया है, वे आमतौर पर उन संस्थानों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हैं जिनको संसद अथवा कार्यपालिका के आदेशों से बाद में गठित किया जाता है।


पहली श्रेणी के संस्थान यानी कि संवैधानिक संस्थानों में संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षा, वित्त आयोग आदि आते हैं। आमतौर पर इन सभी संस्थानों का प्रदर्शन अच्छा रहा है क्योंकि उनकी आजादी की गारंटी खुद देश का संविधान देता है।

 

 इतना ही नहीं उनके काम में भी पिछले दो दशक के दौरान जबरदस्त सुधार हुआ है क्योंकि उन्होंने कांग्रेस सरकार द्वारा उनकी क्षमता कम करने के प्रयासों का जमकर मुकाबला और प्रतिरोध किया।

 

दूसरी श्रेणी में वे संस्थान आते हैं जिनको संसद ने अधिनियम बनाकर गठित किया। मिसाल के तौर पर रिजर्व बैंक, केंद्रीय सतर्कता आयोग, सेबी और ऐसे अनेक संगठन। इनका काम भी कमोबेश अच्छा रहा है।

 

इसकी एक वजह यह है कि वे सरकार को रिपोर्ट करते हैं और उनमें परदे के पीछे कार्यपालिका के हस्तक्षेप की गुंजाइश रहती है।

 

तीसरी श्रेणी उन संस्थानों की है जिनको मंत्रालयों ने गठित किया है। वे मोटे तौर पर संस्थान ही नहीं हैं लेकिन उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अहम भूमिका निभाएं। उनका काम सबसे कम बेहतर रहा है। बल्कि कहा जा सकता है कि उनका प्रदर्शन बुरा रहा क्योंकि वे मूल मंत्रालय के अधीनस्थ बनकर रह गए।


अच्छी बात यह है कि वे नियामकीय संस्थाओं तक ही सीमित रहे जिनके फैसले समीक्षाधीन रहते हैं। उनके बीच की गतिशीलता देश के लिए अहम है।
 

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