वाक स्वतंत्रता के अधिकार और विरोध का तरीका

वाक स्वतंत्रता के अधिकार और विरोध का तरीका

•  फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 'मानव अधिकार की घोषणा' में वाक स्वतंत्रता को मानव के 'सबसे मूल्यवान अधिकारों में से एक' करार दिया गया था।


• भारत ने वाक स्वतंत्रता के अधिकार को विशुद्घ अधिकार के बजाय मूल अधिकारों में जगह दी, जहां संविधान 'सामाजिक सौहार्द' और 'नैतिकता एवं मर्यादा' के आधार पर उसे सीमित करता है, जो एक तरह से बेहद लचीले आधार हैं। क्यों?


• क्योंकि उस लेख को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है, जिससे मित्र देश के साथ रिश्ते खराब हो सकते हों। सिद्घांतों से इतर भी एक व्यावहारिक मुश्किल यह है कि मित्र और शत्रु देशों की कोई स्वीकार्य सूची नहीं है।


•  सर्व धर्म समभाव की सामान्य परंपरा में कोई भी भारतीय प्रकाशक अपनी पूर्ण जानकारी में मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित नहीं करेगा क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की भावनाएं आहत होंगी।


•  1980 के दशक में आई सलमान रुश्दी की किताब 'सटैनिक वर्सेस' को ज्यादातर लोगों के पढऩे से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया, जिस पर तर्क दिया गया कि विरोध का अधिकार भी वाक स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल है और जैसे ही आप उस अधिकार की सीमा तय करेंगे, समाज का पतन शुरू हो जाएगा।


• फिर भी जहां लोग इससे सहमत हैं, वहां भी (उदाहरण के तौर पर) हिटलर की प्रशंसा के लिए एक कानूनी सीमा तय है और यही सीमा नस्लभेदी टिप्पणियों और यहूदियों को निशाना बनाने पर है। इसी तरह अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकियों के खिलाफ अपशब्द बर्दाश्त से बाहर हैं तो वहीं भारत में दलितों के खिलाफ जातिवादी टिप्पणियों पर अदालतें कार्रवाई करेंगी। इसलिए यह मान लेना निरर्थक है कि सांस्कृतिक परंपराओं और आदर्शवाद की कोई भूमिका ही नहीं।


• फिर भी विरोध करने की तत्परता बढ़ी है। आखिर खान की हालिया फिल्म 'पीके' को करोड़ों लोगों ने देखा लेकिन उन्हें हिंदू और मुस्लिम धर्म की हिमायत करने वाले तमाम लोगों के कोप का भाजन बनना पड़ा।


वाक स्वतंत्रता में विरोध का अधिकार भी शामिल है लेकिन उसमें हिंसा की धमकी के लिए कोई जगह नहीं।
 

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