पर्यावरणीय स्वयंसेवी संगठन और उनका विकास विरोधी अभियान

पर्यावरणीय स्वयंसेवी संगठन और उनका विकास विरोधी अभियान:-IB Report

 

सरकार द्वारा हाल में ग्रीनपीस की भारतीय शाखा पर अपनी विदेशी मातृ कंपनी से वित्तीय मदद हासिल करने पर लगाई गई रोक के बाद जो शोरगुल हुआ, वह कुछ अहम सवालों को जन्म देता है। भारतीय लोकतंत्र में विदेशी स्वयंसेवी संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए, खासतौर पर पर्यावरण से जुड़े संगठनों की जो वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन के अग्रदूत हैं। सवाल यह है कि उनका मूल लक्ष्य क्या है? क्या दावे के मुताबिक वाकई वे किसी अंतरराष्टï्रीय नागरिक समुदाय के प्रवक्ता हैं? या फिर उनके स्थानीय प्रतिनिधि अपने विदेशी प्रायोजकों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।


स्वयंसेवी संगठन वास्तव में दबाव बनाने वाले संगठन हैं जो ब्रिटेन और अमेरिका में 200 सालों से राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। अमेरिकी राजनीति विज्ञान बहुलतावादी उनको अनुकूल मानते हैं और वहां विभिन्न हित समूहों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती है जबकि राज्य तटस्थ अंपायर की भूमिका निभाता है।


लेकिन मैनकल ऑल्सोन ने इस बेहतर दृष्टिïकोण को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने दिखाया कि ये आक्रामक होते हैं और राजनीतिक प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने सदस्यों के लिए लाभ हासिल करने में करते हैं। लेकिन घरेलू स्तर पर देखा जाए तो ऐसी बातों का संबंध केवल घरेलू नीति से है। अंतरराष्टï्रीय संगठनों (खासतौर पर पर्यावरण संबंधी) में अंतर यह है कि वे क्षेत्रीय हितों के बजाय एक खास उद्देश्य के लिए काम करते हैं जो एक नैतिक दावे की तरह प्रतिध्वनित होता है।


अन्ना ब्रामवेल अपनी पुस्तक इकॉलजी इन द 20 सेंचुरी: अ हिस्ट्री में जोर देकर कहती हैं कि ब्रिटेन और जर्मनी तथा अमेरिका में पर्यावरणविद कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। इसका मूल दरअसल डॉर्विन और अन्य वैज्ञानिक क्रंातियों के बाद ईसाइयत के प्रभाव में आई कमी से जुड़ा हुआ है। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक अनइंटेंडेड कंसीक्वेंसेज में कहा भी है, पश्चिम पर सेंट अगस्टाइन के सिटी ऑफ गॉड का बहुत अधिक प्रभाव है। कार्ल बेकर ने अपनी पुस्तक द हैवेनली सिटी ऑफ एटींथ सेंचुरी फिलॉस्फर्स में यह दिखाया है कि कैसे तरक्कीपसंद दर्शन ने हैवेनली सिटी के विचार को ध्वस्त किया।


वन्यजीव अधिकार के लिए काम करने वाले अनेक कार्यकर्ताओं द्वारा चिकित्सा शोधकर्ताओं को दी गई विभिन्न हिंसक धमकियों और आगजनी के रूप में इसके उदाहरण देख चुके हैं। हाल ही में ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने पेरू के विश्वदाय स्थल पर जिस तरह घुसपैठ की वह भी इसका उदाहरण है। अगर पेरिस में हाल में घटी घटना से तुलना की जाए तो ये पर्यावरणवादी शार्ली एब्दो नहीं बल्कि उन इस्लामिक कट्टïरपंथियों के करीब ठहरते हैं जिन्होंने पत्रकारों का संहार किया।


उनका यह दावा भी सही नहीं है कि वे दुनिया भर के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इसलिए वे एक अंतरराष्टï्रीय नागरिक समाज के सदस्य हैं जो आम जन के हितों का पालन करता है। चूंकि कोई वैश्विक नीति ही नहीं है इसलिए कोई वैश्विक नागरिक भी नहीं है। केवल अलग-अलग देशों के नागरिक रहते हैं जिनकी सरकारें अपने-अपने स्तर पर जवाबदेह हैं। किसी राज्य का मुख्य गुणधर्म यही है कि उसके पास प्रतिरोध का एकाधिकार होता है। लोकतांत्रिक देशों में यह अधिकार जनता की चुनी हुई सरकार को दिया जाता है। ऐसे में घरेलू और अंतरराष्टï्रीय कानून बनाने का इकलौता अधिकार उसके पास ही होता है।


इन इको-फंडामेंटलिस्ट्स के स्थानीय एजेंटों का क्या? देश के नागरिक के रूप में वे अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं ठीक उसी तरह जैसे एक लोकतांत्रिक देश में हर किसी को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होती है। वे न तो किसी विशेषाधिकार की मांग कर सकते हैं और न ही ऐसा दबाव बना सकते हैं कि उनकी मान्यताओं को लागू किया जाए।
 

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