बजट में हो राज्यों के लिए ज्यादा हिस्सेदारी"

बजट में हो राज्यों के लिए ज्यादा हिस्सेदारी" (Center- State Relation)

 

केंद्रीय वित्त मंत्री को चाहिए कि वह राज्यों को और अधिक खर्च करने का अवसर मुहैया कराएं ताकि विकास दर बढ़े।


आगामी बजट में राज्यों को खर्च में इजाफा करने का अवसर दिया जाना चाहिए। धीमी पड़ती विकास दर को गतिशील बनाने के लिए ऐसा संतुलन कायम करना आवश्यक है। यह राजनीतिक दृष्टिï से भी लाभप्रद कदम होगा।


 देश के 29 राज्यों में से कई अपने आप में उभरते बाजार के समान हैं। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या ब्राजील से ज्यादा है और महाराष्ट्र की मैक्सिको के समान। भारतीय संविधान भी अपने संपूर्ण प्रभाव में संघीय है। सैद्घांतिक तौर पर राज्यों को अपने आर्थिक भाग्य का फैसला करने का अधिकार होना चाहिए।


इन सारी बातों के बावजूद उनको मजबूर किया जाता है। गत वर्ष देश के राज्यों का संयुक्त विकास खर्च देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब 10 फीसदी के बराबर था। यह सिलसिला सन 1990 के दशक से ऐसे ही चल रहा है। यह वही दौर था जब देश की अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की शुरुआत की गई थी। आज इस अपर्याप्त खर्च में करीब आधा हिस्सा केंद्र सरकार का होता है। इसमें राज्यों को केंद्रीय कर में मिलने वाला हिस्सा तथा अनुदान एवं ऋण सब शामिल होते हैं। लेकिन केंद्रीय मदद में यह इजाफा अब हुआ है इससे पहले सन 1990 के दशक के आखिर में इसमें भारी गिरावट देखने को मिली थी।


राज्य के अपने राजस्व के स्रोत बहुत सीमित हैं। संविधान उनको गैर कृषि आय पर कर लगाने की इजाजत नहीं देता है। इसलिए वे लेनदेन और खपत पर शुल्क लगाते हैं। राज्यों में अलग-अलग स्तर पर लगने वाले कर देश को एक प्रभावी एकल बाजार बनने से रोकते हैं। अब केंद्र सरकार संविधान में संशोधन की तैयारी में है I


परिवहन और संचार पर होने वाले खर्च में पेंशन भुगतान का भी हिस्सा है। नकदी की ऐसी किल्लत है कि दिल्ली को छोड़कर तमाम राज्यों को उपनगरीय रेल नेटवर्क विकसित करने के लिए भी निजी क्षेत्र का मुंह देखना पड़ रहा है।


राज्य सरकारों को अपने संसाधनों के दम पर तथा केंद्र से मिलने वाली कुछ सहायता के बल पर जरूरी शहरी बुनियादी ढांचा तैयार करना चाहिए था। कुछ राज्यों के पास जहां दूरदर्शिता की कमी थी, वहीं अन्य धन की कमी से जूझ रहे हैं। इसका दोष केंद्र सरकार को भी दिया जा सकता है जिसने सन 1990 के दशक में सरकारी नौकरशाहों के वेतनभत्तों में भारी बढ़ोतरी की थी और इसका राजकोष पर भारी असर हुआ था। राज्यों को भी उसका अनुकरण करना पड़ा था। पिछले 10 सालों में से 9 सालों के दौरान राज्यों की आय और उनके खर्च के बीच का अंतर एक फीसदी से भी कम हो गया है। इसका इकलौता अपवाद वैश्विक वित्तीय संकट के बाद का दौर रहा जब विस्तारवादी नीतियां अपनाई गईं।


वर्ष 2013 में देश को छोटे पैमाने पर ही सही मुद्रा संकट से जूझना पड़ा था। वह एक चेतावनी थी। तब से केंद्र का ध्यान वित्तीय स्थिति पर ही है लेकिन तेल कीमतों में गिरावट और ईंधन सब्सिडी में कमी के बावजूद मौद्रिक सख्ती को लागू करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अर्थव्यवस्था की विकास दर धीमी है। औद्योगिक उत्पादन ठिठका हुआ है और कर संग्रह बहुत कम है। यहां तक कि इस महीने ब्याज दरों में कटौती करने वाले भारतीय रिजर्व बैंक ने भी यह सपष्टï किया है कि भविष्य में कोई भी मौद्रिक राहत राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर निर्भर करेगी। मुद्रास्फीति फिलहाल कम है और इस बात ने केंद्र को अवसर दिया है कि वह उधार की लागत कम करे और निजी निवेश को बढ़ावा दे।


अर्थशास्त्रियों ने यह दिखाया है कि सरकारी खर्च का प्रत्येक डॉलर अगर केंद्र के बजाय राज्य द्वारा खर्च किया जाए तो वह तीन गुना उत्पादन में सहायक होता है। इसके राजनीतिक लाभों से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने समाजवादी युग के योजना आयोग को खत्म करके राज्य सरकारों की पुरानी मांग की सुनवाई की है। यह एक संविधानेतर संस्था थी जिसे नौकरशाह चलाते थे और जिसके पास राज्यों को जाने वाले कोष का नियंत्रण था।


मोदी ने आयोग की जगह नैशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति) आयोग का गठन कर दिया है। लेकिन अगर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास निजी क्षेत्र के नए रोजगार सृजित करने का पैसा होगा तो राजनीति की स्थिति में भी सुधार होगा। क्योंकि वही लोग जीतेंगे जो बढिय़ा रोजगार पैदा करेंगे। देश के राज्यों के सामने जो राजकोषीय चुनौती है वह चीन से अलग है। वहां जमीन की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते वर्ष 2009 से 2013 के बीच स्थानीय सरकारों का राजस्व करीब 24 फीसदी बढ़ा। अब डॉयचे बैंक के विश्लेषकों का कहना है कि वहां जमीन की कीमतें घटेंगी और इससे अकेले इस वर्ष ही स्थानीय सरकारों के राजस्व में करीब 2 फीसदी की कमी आएगी। इसका असर देश की वृद्घि दर पर भी पड़ेगा।


लेकिन अच्छी बात यह है कि भारतीय राज्यों का कुल कर्ज-उत्पादन अनुपात 20 फीसदी के ऊपर है जो अपने आप में नियंत्रण में है। केंद्र सरकार ने जीडीपी के 50 फीसदी के बराबर कर्ज ले रखा है। जेटली को देश के राज्यों को अपने चीनी समकक्षों के समान बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि वह उन्हें खर्च का ज्यादा अवसर जरूर मुहैया करा सकते हैं। इसके लिए उन्हें कर संग्रह को अधिक उदार ढंग से साझा करना होगा। एक बार देश के राज्यों पर राजकोषीय सख्ती समाप्त हो जाए तो देश की अर्थव्यवस्था खुद को संभालने की स्थिति में होगी।
 

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