परमाणु ढांचे का परिदृश्य & फास्ट ब्रीडर कार्यक्रम

- भारत का विशाल परमाणु ऊर्जा ढांचा होमी जहांगीर भाभा की उपज है। 1950 के दशक में मेघनाथ साहा और डीडी कोसंबी ने सार्वजनिक रूप से अपने मतभेद जाहिर किए थे, किंतु इसमें संदेह नहीं है कि इस संरचना ने भारत की वैज्ञानिक, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं को व्यापक फलक दिया और भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसकी बदौलत ही भारत परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बन सका। हालांकि नाभिकीय ऊर्जा के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन एक हद तक निराशाजनक ही रहा। 

 

- नि:संदेह, 1974 में पहले पोखरण विस्फोट के बाद भारत पर थोपे गए प्रतिबंधों ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बुरी तरह प्रभावित किया। असलियत यह है कि तारापुर में पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र की स्थापना के साढ़े चार दशक बाद भी भारत की कुल विद्युत आपूर्ति में परमाणु ऊर्जा का योगदान महज 3.5 फीसद ही है।

 

- परमाणु ऊर्जा संयंत्र कोयला आधारित बिजलीघरों की तुलना में कम प्रदूषक हैं। ये ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने की जिम्मेदार कार्बन डाईऑक्साइड या मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह सल्फर डाइऑक्साइड गैसों का उत्सर्जन नहीं करते। इस प्रकार पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चिंताओं के बीच यह दयनीय ही है कि भारत का परमाणु कार्यक्रम अभी इतना छोटा है।

 

- अभी तक परमाणु ऊर्जा से महज 4780 मेगावाट बिजली ही मिल पा रही है। इसके अलावा 4800 मेगावाट के संयंत्र अपने निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। इनमें कुडानकुलन में एक-एक हजार मेगावाट के दो परमाणु संयंत्र भी शामिल हैं, जो शुरू होने की अंतिम प्रक्रिया में चल रहे हैं। इसके अलावा शेष सभी योजनाएं अभी कागजों पर ही हैं। 

 

- उदाहरण के लिए फ्रांस की प्रौद्योगिकी से तैयार होने वाले 9600 मेगावाट के जैतापुर परमाणु ऊर्जा पार्क को चार साल पहले पर्यावरण विभाग की ओर से हरी झंडी मिल चुकी है, किंतु अभी तक इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है। 2005 के ऐतिहासिक भारत-अमेरिका परमाणु करार के भी कोई खास नतीजे नहीं आए हैं, सिवाय इसके कि भारत दूसरे देशों से प्राकृतिक यूरेनियम प्राप्त करने में सफल रहा, जो मौजूदा परमाणु संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने में काम आ रहा है। पांच साल पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की क्षमता गिरकर आधी रह गई थी, जो अब 82-83 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

 

- किंतु परमाणु ऊर्जा के इस निराशाजनक परिदृश्य में एक असाधारण प्रगति देखने को मिल रही है। यह है कि भारत विश्व का दूसरा ऐसा देश बन गया है जो वाणिज्यिक स्तर पर प्लूटोनियम और यूरेनियम ऑक्साइड के सम्मिश्रण से चलने वाले फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर बनाने में कामयाब रहा है।

 

- भारत के पांच सौ मेगावाट के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संयंत्र की आधारशिला 11 साल पहले चेन्नई के निकट कलपक्कम में रखी गई थी। अब यह संयंत्र करीब-करीब पूरा होने को है। इसका 97 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। अगले साल के अंत तक यह पूरी तरह क्रियाशील हो जाएगा। भारत के अलावा फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों का निर्माण करने वाला रूस अकेला देश है। रूस में 1200 मेगावाट की क्षमता के दो पीएफबीआर संयंत्र चल रहे हैं। फ्रांस भी 250 मेगावाट की क्षमता का पीएफबीआर संयंत्र बना चुका है, किंतु करीब 35 साल सफलतापूर्वक चलने के बाद अब इसने काम करना बंद कर दिया है। इसके अलावा एक 1200 मेगावाट का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भी 1985 में शुरू किया गया था, किंतु रिएक्टर के कूलेंट के तौर पर काम आने वाले मोल्टन सोडियम के रिसाव के कारण हुई दुर्घटना के चलते इसे बंद कर दिया गया था। इंग्लैंड और जापान भी 1990 के दशक में अपने वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बंद कर चुके हैं।

 

- फास्ट ब्रीडर कार्यक्रम का भारत का फैसला मौलिक और बेदाग है। प्राकृतिक यूरेनियम रिएक्टर के अवशेषों को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने वाले इस प्रकार के कार्यक्त्रम के बिना भारत थोरियम के अपने विशाल भंडारों का इस्तेमाल करने में सफल नहीं हो पाएगा। यूरेनियम के विपरीत थोरियम एक विखंडनीय आणविक सामग्री नहीं है। यह खुद से बिजली का उत्पादन नहीं कर सकता। यह एक उर्वर सामग्री है, जो यूरेनियम-233 जैसी विखंडनीय सामग्री में तब्दील हो जाती है। आकलन अलग-अलग हैं, किंतु आम तौर पर यह माना जाता है कि भारत के पास विश्व के कुल थोरियम भंडार का 25 प्रतिशत है।

 

- फास्ट ब्रीडर ही एकमात्र रास्ता है जिस पर चल कर हम थोरियम के प्रचुर भंडारों से बिजली का उत्पादन कर सकते हैं। फास्ट ब्रीडर का एक लाभ यह भी है कि जले हुए ईंधन की रिसाइक्लिंग से लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले अधिकांश रेडियोधर्मी तत्व नष्ट हो जाते हैं। फिलहाल, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के 500 मेगावाट के दो और संयंत्र कलपक्कम में लगाने की योजना है। ये अगले दशक के उत्तारार्ध तक चालू हो पाएंगे। इनके अलावा दो और संयंत्र लगाने की योजना है, जिसके स्थान का अभी निर्धारण नहीं किया गया है।

 

- इस क्षेत्र में भारत दुनिया का शीर्ष देश हो गया है। परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान का इरादा साल 2030 तक 63000 मेगावाट विद्युत उत्पादन का है। जब हम लो कार्बन के पथ पर तेजी से बढ़ सकते हैं तो बड़ा सोचना और करना महत्वपूर्ण हो जाता है। किंतु अतीत के प्रदर्शन और जमीनी हकीकत के आलोक में यह लक्ष्य बहुत महत्वाकांक्षी और अवास्तविक लगता है। योजना आयोग के लो कार्बन नीति विशेषज्ञ समूह ने इसे घटाकर 40 हजार मेगावाट किया था, यह भी एक बड़ा लक्ष्य है। 2030 में इस क्षमता के स्तर पर कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत हो जाएगी। करीब-करीब इतना ही योगदान सौर व पवन ऊर्जा का भी होगा। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए भी वैश्रि्वक कंपनियों की कुछ चिंताओं को दूर करना होगा। इनमें नवंबर 2011 में संसद द्वारा पारित परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक शामिल है।

 

- राष्ट्रपति बराक ओबामा की आगामी भारत यात्रा के मद्देनजर इस विवादास्पद मुद्दे का समाधान तत्काल आवश्यक है। कहा जा रहा है कि संभवत: यही समय है जब आयातित रिएक्टरों को पाने की कोशिश के साथ-साथ स्वदेशी भारी जल रिएक्टरों के विस्तार की दिशा में भी मजबूत कदम उठाए जाएं। अंतत: तीन वर्ष पहले संसद में रखे गए विधेयक के संदर्भ में भारत को वास्तविक रूप में एक स्वतंत्र नियामक बनाने की आवश्यकता है। 

 

- इस नियामक संस्था को चाहिए कि वह परमाणु तकनीक से जुड़े सुरक्षा और दूसरे जोखिमों को लेकर लोगों की चिंताओं का समाधान करे। इस वर्ष शुरुआत में भारत प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा अपने परमाणु नियामक तंत्र की समीक्षा के लिए सहमत हुआ था और उम्मीद है कि आगामी कुछ महीनों में इसकी घोषणा कर दी जाएगी।

 

- ऐसा पहली बार होगा जब इस तरह की कोई औपचारिक समीक्षा होगी, जिससे परमाणु ऊर्जा संस्थान की योजनाओं को लेकर आम लोगों का विश्वास बढ़ेगा।  

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