राष्ट्रीय कृषि विकास योजना

- कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा ताजा प्रयासों और किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कृषि विकास रणनीतियों के बीच समन्वय कायम करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) ने मई 2007 को एक प्रस्ताव लागू किया था।  - इसका लक्ष्य 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि क्षेत्र में 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर कायम करना था। इसके लिए वर्ष 2007-08 के दौरान 25,000 करोड़ रुपए की लागत से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) नामक एक नई योजना शुरू की गई थी, जो कृषि और संबंधित क्षेत्रों में राज्यों को अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता (एसीए) प्रदान करने के लिए थी। - इस योजना के अधीन राज्यों के लिए यह आवश्यक है कि वे ऐसी बुनियादी सुविधाओं के सृजन के लिए जिला और राज्य कृषि योजनाओं को तैयार करें, जो अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मौजूदा उत्पादन परिदृश्य में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने के लिए अनिवार्य हो। राज्यों को अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता के रूप में शत-प्रतिशत अनुदान उपलब्ध कराये जाते हैं। - राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के मार्गनिर्देशों में जिला/राज्य स्तर पर कार्यान्वित विभिन्न कार्यक्रमों का जिला कृषि योजना और राज्य कृषि योजना के रूप में विलय और समन्वय करने की जरूरत पर जोर दिया गया है। प्रत्येक जिले के लिए एक जिला कृषि योजना तैयार करना आवश्यक होता है जिसमें पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि, स्वर्णजयंती ग्राम स्वराज योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, भारत निर्माण जैसी मौजूदा जिला, राज्य अथवा केन्द्रीय योजनाओं और अन्य योजनाओं से उपलब्ध संसाधनों को शामिल किया जाता है। जिला कृषि योजनाएं सामान्य रूप से मौजूदा योजनाओं का समग्र रूप नहीं होती हैं किंतु इसका उद्देश्य जिले का कृषि और संबंधित क्षेत्रों के विकास के लिए आवश्यकताओं का आकलन करना है। - ये योजनाएं जिले के कुल मिलाकर विकास परिदृश्य में कृषि और संबंधित क्षेत्रों के लिए एक दृष्टिकोण पेश करती हैं। जिला कृषि योजनाओं से व्यापक तौर पर कृषि विकास के लिए वित्तपोषण के स्रोतों और वित्तीय आवश्यकताओं का पता चलता है। जिला कृषि योजना में पशुपालन और मछली पालन, लघु सिंचाई परियोजनाएं, ग्रामीण विकास के कार्य, कृषि विपणन योजनाएं और जल संभरण तथा संरक्षण से संबंधित योजनाएं शामिल हैं। इसमें प्रत्येक जिले में प्राकृतिक संसाधनों और प्रौद्योगिकीय संभावनाओं का ध्यान रखा जाता है। इसके बाद प्रत्येक राज्य के लिए जिला कृषि योजनाओं को एक साथ मिलाकर एक व्यापक राज्य कृषि योजना तैयार करना जरूरी होता है। राज्य उन स्रोतों का संकेत देते हैं, जिसे राज्य से जिले तक भेजा जा सकता है। - 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तीन प्रकार से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए वित्तपोषण किया जाएगा, जिसमें उत्पादन वृद्धि (35 प्रतिशत), आधारभूत सुविधाएं और संसाधन तथा उप-योजनाएं (20 प्रतिशत) शामिल हैं। शेष 10 प्रतिशत धनराशि का प्रावधान लोचशील निधि के रूप में किया जाएगा जिसे राज्य या तो उत्पादन वृद्धि अथवा आधारभूत सुविधाओं और संसाधनों से जुड़ी परियोजनाओं से कर सकते हैं। यह राज्यों की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं पर आधारित है। बढ़ते निवेश संबंधित जरूरतों को देखते हुए सरकार ने हाल में उत्पादन के लिए 35 प्रतिशत आवश्यकताओं का रास्ता खोल दिया है जिससे आधारभूत निर्माण और संसाधनों के लिए शत-प्रतिशत आवंटन करना संभव हो पाया है। - राज्यों को योजनाओं के चयन, आयोजना, मंजूरी और कार्यान्वयन की प्रक्रिया में लोचशीलता और स्वायत्तता दी गई है ताकि वे अपने प्राथमिकताओं और कृषि-जलवायु संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार निवेश कर सकें और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। राज्य सरकारों की परियोजनओं की मंजूरी संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय मंजूरी समिति द्वारा की जाती है। राज्य कृषि विभाग के माध्यम से धन भेजा जाता है, जो इस योजना के लिए शीर्ष विभाग है।  

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