योजना आयोग की जगह नीति आयोग की आवश्यकता क्यों हुई ?

- 1991 के आर्थिक सुधार निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने वाले थे। इसके बाद ही योजना आयोग की भूमिका और उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न् लगने शुरू हो गए। नीति आयोग का गठन भी संसद के किसी कानून के अंतर्गत नहीं हुआ है, बल्कि यह केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्णय पर आधारित है। इसे नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफारमिंग इंडिया (एनआइटीआइ) का नाम दिया गया है।

 

- विगत कुछ वर्षो से योजना आयोग विवादों के घेरे में रहा। गरीबी रेखा की इसकी परिभाषा ने इसे और अधिक विवाद का विषय बनाया है। अपने पुराने रूप में योजना आयोग केंद्र सरकार के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया था। जिन राज्यों में केंद्र में शासन करने वाली पार्टी की हुकूमत नहीं थी उसके साथ भेदभाव बढ़ता जा रहा था। नीति आयोग के गठन का यह भी एक बड़ा कारण है। नीति आयोग का स्वरूप योजना आयोग से बहुत अलग नहीं है।

 

- प्रधानमंत्री पहले भी आयोग के अध्यक्ष थे अब भी वही रहेंगे, उपाध्यक्ष की नियुक्ति पहले भी प्रधानमंत्री करते थे अब भी करेंगे, नए आयोग में 5 पूर्णकालिक और 2 अंशकालिक सदस्य होंगे जिनकी नियुक्ति सरकार करेगी। 4 केंद्रीय मंत्री इसमें नामित होंगे। सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उपराज्यपालों की एक समिति होगी, जो नीतिगत निर्णय लेगी।

 

- उपाध्यक्ष मुख्य कार्यकारी होगा। विशेषज्ञों की नियुक्ति में निजी क्षेत्र की भी भागीदारी होगी। क्षेत्रीय काउंसिलें बनाई जाएंगी जो विवादास्पद विषयों पर विचार करेंगी और उन्हें सुलझाने के सुझाव देंगी। लंबी अवधि की योजनाएं अभी भी आयोग तैयार करेगा, किंतु छोटी अवधि की योजनाएं गांवों के स्तर से शुरू करने की बात कही जा रही है।

 

- पहले योजनाएं ऊपर से बनाकर गांव स्तर तक ले जाने की नीति थी अब गांवों के स्तर से ऊपर जाने की नीति अपनाई जाएगी। योजना आयोग के मार्ग निर्देशन के लिए पहले एक राष्ट्रीय विकास परिषद थी, जिसमें राज्यों के मुख्यमंत्री और सरकार के नामित सदस्य होते थे। इस परिषद का क्या होगा, इस बारे में कोई घोषणा नहीं की गई है, किंतु नीति आयोग का जो ढांचा प्रस्तुत किया गया है उसमें इस परिषद की आवश्यकता ही नहीं है।

 

- नीति आयोग मुख्यमंत्रियों की समिति के माध्यम से नीतिगत निर्णय लेने में समर्थ होगा। राष्ट्रीय विकास परिषद वैसे भी प्रभावशाली नहीं रही। गहन आर्थिक विषयों पर चर्चा के लिए न तो इसके सदस्यों को समय मिलता था और न ही सरकार की मंशा नीतिगत मामले में इसके माध्यम से निर्णय लेने की होती थी। नीति आयोग का गठन जहां एक ओर योजनाओं के विकेंद्रीयकरण और निजीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है, वहीं नई सरकार की निर्णय प्रक्रिया की ओर भी यह स्पष्ट संकेत देता है। नेहरू युग का अंत और एक नए युग की शुरुआत मात्र चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि एक वास्तविकता है।

 

- अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घट रही है, निवेश निजी क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। विदेशी पूंजी आकर्षित करने के सभी संभव प्रयत्न सरकार कर रही हैं तो ऐसे में मुक्त बाजार व्यवस्था को बढ़ावा देना एक मजबूरी बनती जा रही है।

 

- योजना आयोग जैसी नियंत्रक संस्थाओं की भूमिका सभी विकासशील देशों में कम होती जा रही है। किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका अभी भी अहम है, खास तौर से भारत जैसे विकासशील देश में जहां एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, बड़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं।

 

- नीति आयोग के तीन मुख्य अंग-इंटर स्टेट काउंसिल, लंबी अवधि की योजना और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर विभाग कितने प्रभावशाली होंगे, यह केंद्र सरकार की राज्यों को साथ लेकर चलने, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास की योजनाओं को सरकारी और निजी क्षेत्र के सहयोग से प्रभावशाली ढंग से चलाने और गरीबों तक सब्सिडी बिना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के पहुंचाने की क्षमता पर निर्भर करेगा।  

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