भारत-रूस संबंधों के नए आयाम

- पुतिन ऐसे समय भारत आए, जब देश धर्म परिवर्तन, गोमूत्र से लेकर गीता में व्यस्त है। पता नहीं कितने लोग इससे भिज्ञ हैं कि गीता को रूसी मानस उतना ही सम्मान देता है, जितना कि हम भारतवासी। भगवदगीता का पहला रूसी अनुवाद 226 साल पहले, साम्राज्ञी कैथरिन द ग्रेट के शासनकाल में एक आदेश के बाद किया गया था। 1788 में भगवदगीता के रूसी संस्करण के प्रकाशन को अगर हमारी विदेशमंत्री सुषमा स्वराज स्मरण कर लेतीं, तो उन्हें शायद यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित कर देना चाहिए।

 

दुनिया की अस्सी भाषाओं में अनूदित गीता की कोई आठ करोड़ प्रतियों के छापे जाने का अनोखा कीर्तिमान है। लेकिन गीता का सूत्रवाक्य ‘क्या लेकर आए थे, और क्या लेकर जाओगे’ का कूटनीति में कोई स्थान नहीं है।

 

- जहां अगले पांच वर्षों में बीस अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य हो, वहां गीता पाठ से बात नहीं बनती। खासकर तब, जब भारत-रूस के बीच 2.1 अरब डॉलर के खान से निकले हीरे की आपूर्ति, बारह एटमी बिजलीघरों को स्थापित करने, पांचवीं पीढ़ी के रूस के लड़ाकू हेलिकॉप्टर और उसके द्वारा निर्यात किए जाने वाले सैन्य साजो-सामान अब भारत में बनाए जाने पर समझौते हो रहे हों। रूस पहली बार आयुध प्रौद्योगिकी और आयुध उद्योग के क्षेत्र में संयुक्त रूप से उत्पादन के लिए राजी हुआ है। पिछले पांच वर्षों से भारत इस तरह का प्रस्ताव देता आया है। 18 जून 2014 को रूसी उपप्रधानमंत्री दिमित्री रोगोजिन ने भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज से भेंट के बाद स्पष्ट किया कि हम साझा सैन्य उत्पादन भारत में करने को तैयार हैं। ऐसा नहीं है कि रूसी हथियार कंपनियां पहली बार किसी देश में संयुक्त उत्पादन के लिए तैयार हुई हों। अक्तूबर 2013 में ईरान और रूस हवाई सुरक्षा के क्षेत्र में साझा उपक्रम लगाने के वास्ते समझौता कर चुके थे। ईरान में रूस को बवार-373 मिसाइल डिफेंस सिस्टम विकसित करना था, जिसे रोकने के लिए अमेरिका और उसके पश्चिमी मित्रों ने काफी दबाव बना रखा था।

 

-रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यह छठी भारत यात्रा थी। पंद्रहवीं वार्षिक शिखर बैठक से पहले पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुरुवार को तीसरी बार मिले। पता नहीं, ऐसा क्यों है कि ब्राजीलिया से ब्रिसबेन तक पुतिन और मोदी की मुलाकातों पर उतने ढोल-नगाड़े नहीं बजे। जबकि ओबामा-मोदी के मिलन को मीडिया, राम-भरत मिलाप से भी अधिक ‘हाइप’ पैदा कर चुका है। इस मंजर को आगे देखना है, तो 26 जनवरी 2015 का इंतजार कीजिए, जब बराक ओबामा गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि होंगे।

 

-पुतिन ने दो दिन पहले मास्को में जारी एक बयान में कहा भी कि पिछले साल भारत-रूस के बीच दस अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जो उससे पहले के साल के मुकाबले एक अरब डॉलर कम रहा। पुतिन ने कहा, ‘हमारा मुख्य जोर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग और विकास पर है, जिसमें एटमी ऊर्जा, सैन्य तकनीकी सहयोग, अंतरिक्ष अनुसंधान, विमान, मोटरकार, औषधि, रसायन, हीरा, सूचना उद्योगों को विस्तार देना है।’ रूसी वित्तमंत्री ने एक बयान में कहा कि यूक्रेन विवाद के कारण प्रतिबंध से उनके देश को सालाना चालीस अरब डॉलर का घाटा हो रहा है।

 

-‘मनमोहनॉमिक्स’ से ‘मोदीनॉमिक्स’ की ओर स्थानांतरित होती हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ की ओर एकतरफा न चल पड़े, इसके खतरे मंडराते रहेंगे। यों, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि रूस पर जो प्रतिबंध लगा है, उस कूटनीति में वह पड़ना नहीं चाहता। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? 2014 में भारत को 1.9 अरब डॉलर की सैन्य सामग्री निर्यात कर ‘नंबर वन सप्लायर’ बनने वाला अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि उसके निवाले को रूस छीन ले जाए। रूस को भारत को किए जाने वाले हथियार निर्यात के क्षेत्र में इजराइल से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। पुतिन के बयानों से लगता है कि गैस, तेल और नाभिकीय ऊर्जा विपणन के क्षेत्र में उन्हें यूरोप से अधिक भरोसेमंद और टिकाऊ बाजार एशिया लगने लगा है।

 

- दक्षिण एशिया में रूस की अभी जो रणनीति बन रही है, वह 2015 को दृष्टि में रख कर बन रही है। अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों के हटने के बाद 2015 में रूस, चीन, पाकिस्तान, ईरान की धुरी कितनी सशक्त होगी, और इसमें भारत कितना फिट बैठेगा, इस बात को अभी से ध्यान में रखने की जरूरत है। फरवरी 1989 में सोवियत सेना की अफगानिस्तान से वापसी के बाद भी मास्को चुप नहीं बैठा रहा। तब रूस लगातार अहमद शाह मसूद, अब्दुल रशीद दोस्तम, हाजी अब्दुल कादिर जैसे नार्दर्न अलायंस के नेताओं की जमीन पुख्ता करने के लिए रणनीति बनाता रहा। सितंबर 1996 में अफगानिस्तान में नार्दर्न अलायंस के सक्रिय होने के बाद रूस ने तुर्की, भारत, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान, चीन की एक धुरी तैयार की थी, जिसका मकसद तालिबान की सत्ता को समाप्त करना था।

 

-  उन दिनों अलकायदा तालिबान की मदद कर रहा था, जिसके गढ़ पाकिस्तान के कबीलाई इलाके थे। अमेरिका की अपनी रणनीति थी, जिसमें वह परोक्ष रूप से पाकिस्तान को अपने पाले में किए हुए था। यही कारण था कि 1989 में जलालाबाद पर कब्जा करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को आदेश देने पड़े थे। इस कार्रवाई के लिए इस्लामाबाद में उन दिनों तैनात अमेरिकी राजदूत राबर्ट बी ओक्ले ने सारी रणनीति बनाई थी।

 

- पाकिस्तान को अमेरिकी दबदबे से बाहर निकालना रूस के लिए बड़ी चुनौती रही है। यह 1990 के दिनों की बात है, जब सोवियत संघ ने पाकिस्तान में एक हजार मेगावाट के एटमी बिजलीघर लगाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे बेनजीर भुट््टो, और बाद में 1992 में नवाज शरीफ ने ठुकरा दिया। पाकिस्तान को अपने आईने में उतारने में रूस को एक दशक और लगे। अप्रैल 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए रूस ने पलक पांवड़े बिछा दिए। पच्चीस वर्षों में किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए पहली बार रूस में स्वागत के फूल बरसाए गए। उसके बारह साल बाद, 11 मई 2011 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का क्रेमलिन में भव्य स्वागत किया गया था। उस समय के रूसी राष्ट्रपति मेदेवदेव ने जरदारी से यह बयान साझा किया कि एटमी ऊर्जा, व्यापार, निवेश और आतंकवाद उन्मूलन में हम आपस में सहयोग करेंगे।

 

- वर्ष 2011 रूस-पाकिस्तान संबंधों केप्रगाढ़ होने का साल रहा। उस साल सेंट पीटर्सबर्ग में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक हुई, जिसमें रूस ने पाकिस्तान को पूर्ण सदस्यता दिए जाने का प्रस्ताव रखा था। 2011 में ही रूस ने पाक सीमाओं पर नाटो हमले की भर्त्सना की। पश्चिमी देशों को लग गया कि मास्को और इस्लामाबाद के बीच बिरयानी पक रही है। 2012 में पुतिन ने घोषणा की कि चुनाव के बाद मैं पाकिस्तान की यात्रा करूंगा। लेकिन पुतिन अब तक पाकिस्तान नहीं पधारे। रूस ने पाकिस्तान को हथियार बिक्री पर प्रतिबंध आयद किया था, जिसे हटा लिया। इससे इस्लामाबाद को एमआइ-35 मल्टीरोल हेलिकॉप्टर की बिक्री आसान हो गई।  

 

- यह संभव है कि रूस, भारत पर दबाव बनाने के वास्ते पाकिस्तान की तरफ मुखातिब हो गया। 20 नवंबर को रूसी रक्षामंत्री सर्गे शोइगू इस्लामाबाद आए और पाकिस्तान से ऐतिहासिक रक्षा समझौता कर गए। रूस, पाक एयरलाइंस पीआइए को सुखोई व्यावसायिक विमान लीज पर दे चुका है। थार और मुजफ्फराबाद के गुड््डू बिजली संयंत्रों की उत्पादन-क्षमता बढ़ाने में रूस लगा हुआ है।  

 

-वह पाकिस्तान के इस्पात कारखानों का उत्पादन दस लाख टन से बढ़ा कर तीस लाख टन करने के लिए तकनीकी सहयोग दे रहा है। वॉयस आॅफ रशिया के अनुसार, 1996 से 2010 तक रूस पाकिस्तान को सिर्फ सत्तर एमआइ-17 ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर दे पाया था। जबकि भारत में तोप से लेकर पोत तक, और सैनिक साज-सामान पचहत्तर प्रतिशत रूस से आयात हुआ है।  

 

- भारत में इस समय सत्रह परमाणु बिजलीघर चालू हैं। 2030 तक पच्चीस से तीस परमाणु बिजलीघर बनाने का कार्यक्रम यूपीए सरकार तय कर चुकी थी। इस साल अप्रैल में कूडनकूलम की तीसरी और चौथी इकाई के लिए मुंबई में हस्ताक्षर किए गए। अब पुतिन ने कहा है कि हम भारत में एटमी बिजलीघर की पच्चीस यूनिटें लगा सकते हैं। तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत पाइपलाइन (तापी) में रूस की सरकारी कंपनी गाजप्रोम के जुड़ जाने से पुतिन अपनी ऊर्जा कूटनीति का इस इलाके में विस्तार करेंगे। पुतिन जानते हैं कि पाकिस्तान को इतना सहयोग देने के बावजूद रूस के खजाने में कुछ आना नहीं है। मुफ्तखोरी पाकिस्तान की फितरत बन चुकी है, इसलिए रूस अधिक से अधिक इस सहयोग का रणनीतिक इस्तेमाल कर सकता है।

 

-     रूस का असल व्यापार तो भारत से होना है। तभी पुतिन ने कहा कि भारत को भी शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य बन जाना चाहिए, हमने बाधाएं दूर कर दी हैं। पुतिन ‘यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन’ को यूरोपीय संघ के मुकाबले खड़ा करना चाहते हैं। क्या इसके लिए पुतिन दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर भी देख रहे हैं? यह पुतिन की विवशता है कि उन्हें एशिया में व्यापार और शक्ति के विस्तार के लिए भारत का साथ चाहिए। शायद इसलिए रूस, ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ के तराने को भूल नहीं पाता!    

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