क्या भारत 21वीं सदी का सिरमौर बन सकेगा?

- आजादी के कुछ समय बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लंदन से रेडियो के जरिए यह संदेश दिया था कि आज हमें शांति और सभ्य व्यवहार की आवश्यकता है, हम युद्ध नहीं चाहते। लेकिन सच तो इसके उलट है क्योंकि भारत को युद्ध तो झेलने पड़े, वह एक नहीं, तीन-तीन (यदि करगिल को भी जोड़ लिया जाए तो साढ़े तीन युद्ध)। 

 

- 1962 में चीन के हाथों भारत को पराजय का मुंह भी देखना पड़ा और तमाम भू-क्षेत्र भी चीन के पास चला गया। युद्ध ही नहीं, कूटनीतिक के क्षेत्र में भारत लाभ की स्थिति प्राप्त करने में सफल रहा। इसलिए एक सवाल यह उठता है कि क्या हमारी विदेश नीति में कोई खामी थी या फिर मान लिया जाए कि व्यक्तिगत रूप से हमारा नेतृत्व जिम्मेदार रहा है। एक प्रश्न यह भी है कि क्या वर्तमान समय में भारतीय विदेश नीति सही ट्रैक पर चल रही है या आज भी यथार्थवाद पर आदर्शवाद अथवा स्वांग जैसी चीजें हावी हो जा रही हैं?

 

- सामान्य तौर पर यह माना जाता रहा है कि आजादी के बाद भारत को 'रीयल पॉलिटिकÓ अथवा रणनीति सम्बंधी स्थिति का अपना कोई अनुभव नहीं था जिसका स्वतंत्र देश सामना कर रहे थे, इसलिए सुरक्षा और शक्ति-समीकरण के सम्बंध में उस समय भारत का दृष्टिकोण आदर्शवादी रहा। इसके दो कारण भी थे। 

 

- आरम्भ में भारत यह मानता रहा कि उसके सामने भौगोलिक अखंडता या राजनीतिक-आर्थिक सुरक्षा का खतरा नहीं था। दूसरी धारणा यह थी कि चूंकि भारत शीतयुद्ध में किसी का पक्ष नहीं ले रहा था इसलिए जवाहरलाल नेहरू को लगता था कि भारत पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन यह आकलन गलत साबित हुआ और खामियाजा भारत को भुगतना पड़ा। हालांकि यह कहना अनुचित होगा कि नेहरू का उन स्थितियों की समझ नहीं थी लेकिन ऐसा जरूर कहा जा सकता है कि नेहरू ने भारतीय आदर्शवाद के चश्मे से चीन जैसे देश को देखने की कोशिश की थी। 

 

- इस सम्बंध में माइकेल ब्रेशर ने कृष्णा मेनन से कहा था कि नेहरूजी चाऊ एन लाई को सुलझा हुआ, संसदीय प्रणाली में निष्ठा रखने वाला उदारपंथी व मध्यममार्गी समझते थे। पता नहीं, चीनी गृहयुद्ध व साम्यवादी क्रांति के इतिहास से सुपरिचित होने के बावजूद उन्होंने किस आधार पर ऐसी मान्यता बनाई थी। तो क्या यह मान लिया जाए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन आदर्शों से परे जाएंगे जो भारत के निर्माताओं की देन रहे है? 

 

- सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि तब भारत एक देश के रूप में रूप पेश होता था और देश का प्रधानमंत्री एक नेता के रूप में जिसके सामने राष्ट्र और जनता के हित सुस्पष्ट होते थे लेकिन आज देश बाजार है और प्रधानमंत्री सबसे बड़े कारोबारी के रूप में पेश होता है। इसलिए उसकी मूलभूत शैली एक व्यापारी की है जो हाउ टू प्रेजेंट (हिमसेल्फ) की मैकेनिज्म पर आधारित है, तब एक ठोस कूटनीतिक प्रगति कैसे सम्भव होगी, यह चिंता का विषय है। यह हो सकता है कि पिछली गल्तियां न दोहराई जाएं लेकिन नयी गल्तियां नहीं होंगी यह कहना मुश्किल है।

 

- भारत की विदेश नीति में व्यक्तित्वों की बेहद प्रभावी भूमिका रही है। यदि जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक के समय को देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि विदेश नीति उनके व्यक्तित्वों के अनुसार ही कमजोर, मजबूत अथवा आक्रामक या शिथिल, आदर्शवादी या फिर व्यवहारिक रही। अभी तक मोदी के व्यक्तित्व को जिस तरह से पेश किया गया है या मोदी ने स्वयं ही अपने आपको पेश किया है उससे यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उनका व्यक्तित्व आक्रामक, कुशल और सक्षम राजनेता का है। 

 

- लेकिन इस बात को अस्वीकार करना गलत होगा कि नरेन्द्र मोदी को जवाहरलाल नेहरू के बराबर न तो दुनिया का ज्ञान है और न ही उनके जैसी संवाद की गम्भीर विरासत नरेन्द्र मोदी के पास है। फिर नरेन्द्र मोदी से किस आधार पर यह उम्मीद की जा रही है कि नरेन्द्र मोदी भारत को ऐसे फलक पर ले जाने में कामयाब हो जाएंगे जहां भारत 21वीं सदी का सिरमौर बन सकेगा? पिछले छ: महीनों की विदेश नीति सम्बंधी गतिविधियों पर गौर करें तो पता चलेगा कि भारत ने मनमोहन सिंह के काल में की गये कार्यों को ही आगे बढ़ाया है, हां, व्यक्तिगततौर पर नरेन्द्र मोदी ने अपने एजेंडे का सफल जरूर बनाया है जो कि मनमोहन सिंह नहीं कर पाए थे। नरेन्द्र मोदी ने अब तक स्वयं को आगे और देश को पीछे रखकर काम किया है।

 

- यही कारण है कि अभी तक भारत के हाथ कोई ऐसी उपलब्धि नहीं लगी है जिसे नयी और 21वीं सदी की विशिष्ट उपलब्धि के रूप में माना जा सके।  इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति ठिठकी सी रही। पिछले दस वर्षों का अनुभव यह बताता है कि डॉ. मनमोहन सिंह दुनिया में होने वाले बदलावों और वहां उभरने वाली चुनौतियों को जानने-समझने और फिर उनके अनुसार भारत को बदलने की बजाय चीन और पाकिस्तान पर अटके रहे और समाधानों के लिए अमेरिका की ओर देखते रहे। जबकि पाकिस्तानी सैनिक व आतंकवादी भारत के शरीर पर लगातार घाव लगाते रहे।

 

चीन लगातार भारतीय सीमा पर उत्पात मचाता रहा, पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ षडय़ंत्र रचता रहा और कई बार उसने भारत में घुसपैठ की, लेकिन मनमोहन सिंह इसके लिए चीन की बजाय भारतीय मीडिया को कोसते रहे। यही नहीं, चीन ने इसी दौर में स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स के जरिए भारत को घेरने में कामयाबी हासिल कर ली।

 

- श्रीलंका के मामले में वे कोई ऐसा स्टैंड नहीं ले सके जो भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। इस शिथिलता का परिणाम यह हुआ कि श्रीलंका विरोधी खेमे की ओर खिसक गया जिसके फलस्वरूप आईएसआई, इस्लामी कट्टरपंथ तथा चीन की मिलीभगत से भारत-विरोधी रणनीति तेजी से तैयार हो रही है। नेपाल की स्थिति थोड़ी भिन्न है लेकिन चीन वहां भी भारत का भय दिखाकर अपने उद्देश्यों को पूरा करना चाहता है। यही नहीं, चीन बंगलादेश और मालदीव जैसे पड़ोसियों में भी अपनी पैठ बनाने में सफल हो गया है। स्वाभाविक है चीन इन देशों में जितनी गहरी पैठ बनाता चला जाएगा, भारत का उतना ही प्रभाव कम होगा। एक सच यह भी है कि पिछले एक दशक में भारत का इन देशों में प्रभाव कम हुआ है। लेकिन क्या अब सब कुछ वाकई में बदल रहा है?

 

- शपथ ग्रहण के समय से ही नरेन्द्र मोदी ने दक्षेस देशों के साथ रिश्तों को व्यवहारिक स्थिति प्रदान करने की कोशिश की। कुछ हद तक उसमें सफलता भी मिली लेकिन पाकिस्तान की स्थिति अभी भी पहली जैसी ही है। बल्कि चीन काश्गर से ग्वादर तक सड़क बना रहा है जो भारतीय सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं है। हालांकि जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से सम्बंध और बेहतर हो रहे हैं लेकिन ये देश भारत के क्रोड क्षेत्र से बाहर के हैं और भारत की सबसे प्रमुख चुनौती इसी क्षेत्र में है। इसलिए क्रोड एरिया से बाहर की कूटनीति भारत को उतना देगी नहीं जितना कि भारत को नुकसान हो सकता है। रही बात आर्थिक और तकनीकी अनुलाभों की, तो इनमें कुछ भी नया नहीं है वे तो भारत के बड़े बाजार होने के प्रतिफल हैं न कि भारत की कूटनीतिक क्षमता के।

 

- फिलहाल भारतीय नेतृत्व को यदि भारत के खाते में प्रगति दर्ज करानी है तो उसे निम्नलिखित विषयों पर ठोस कदम उठाने होंगे। 

1. भारत को वास्तविक आर्थिक ताकत बनाना होगा।

2. भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी दर्जा दिलाना होगा। 

3. अमेरिका से बराबरी के आधार पर रिश्ते कायम करने होंगे जिनकी प्रकृति एक कारोबारी जैसी नहीं, बल्कि एक समृद्ध और सक्षम राष्ट्र जैसी होनी चाहिए।

4. पाकिस्तान और चीन को सीमा में रहने के लिए कड़ा संदेश देना होगा। 

5. रूस के साथ सुस्पष्ट स्ट्रैटेजिक सम्बंध बनाने होंगे ताकि अमेरिका और चीन को काउंटर किया जा सके।

6. हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में चीन और अमेरिका जिस हलचल को पैदा कर रहे हैं, उसके रणनीतिक पक्षों को समझना होगा। 

7. यूरोप-रूस टकराव और इस्लामी स्टेट के बढ़ते कदमों की दिशा और उसके प्रभावों का अध्ययन करना होगा ताकि इन पर अंकुश लगाया जा सके। उम्मीद है भारत यथार्थवाद पर छद्म आदर्शवाद को हावी नहीं होने देगा।  

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