कैसे बदलेगा पुलिस का चेहरा

- पुलिस तंत्र में सुधार को लेकर हमारे प्रधानमंत्री ने जो सूत्र दिया है, उसे अपनाया जाए तो हमारी पुलिस व्यवस्था यकीनन स्मार्ट बन सकती है. पुलिस के लिए यह स्मार्टनेस जरूरी नहीं बल्कि अनिवार्य है. गुवाहाटी में पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में स्मार्ट पुलिस की जो नई व्याख्या सामने रखी गई, उससे शायद ही कोई असहमत हो. यह पुलिस की आधुनिक परिभाषा के खांचे में फिट बैठती है. पुलिस को होना ऐसा ही चाहिए लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए किया क्या   जाए? जो परिवर्तन जरूरी हैं उन्हें कैसे धरातल पर उतारा जाए?  दरअसल, पुलिस से हम अपेक्षा तो काफी रखते हैं, लेकिन उसे वैसा होने नहीं देना चाहते जिससे वह सही मायनों में हमारी अपेक्षाओं को पूरी कर सके. हम चाहते हैं कि पुलिस संवेदनशील हो, लेकिन वह हमें सख्ती करती दिखती है. यकीनन वह सख्ती करती है, कर सकती है, लेकिन ऐसा आम लोगों के साथ ही ज्यादा होता है.  

 

बड़े मामलों में उसके हाथ बंधे होते हैं. महत्वपूर्ण व्यक्तियों, खासकर यदि वह राजनीति से जुड़ा हो, तो पुलिस चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती. जरूरी होते हुए भी वह सख्ती नहीं दिखा पाती और ऐसे में अपनी हताशा आम आदमी पर और ज्यादा सख्ती कर निकालती है. पुलिस पर बाहरी तौर पर इतने बंधन हैं कि वह चाहकर भी अपना काम सही तरीके से नहीं कर सकती. सरकार के कारण भी कई बार वह संवेदनशील नहीं रह पाती. उसे तो बस आदेश का पालन करना होता है.

 

यहां संवेदनशीलता बरतने का मतलब होता है आदेश के पालन में भी कोताही बरतना. पुलिस की छवि आम लोगों में नकारात्मक है और इसके लिए सिर्फ फिल्में दोषी नहीं. फिल्म तो वही दिखाती है जैसा आम लोगों में पुलिसिया छवि है. फिर फिल्में पुलिस को सकारात्मक भूमिका में भी दिखाती हैं इसमें दो राय नहीं. पुलिस की छवि खराब होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आजादी मिलने के बाद पुलिस में गुणात्मक सुधार करने पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. फिरंगी हुकूमत ने हमें विरासत में जो पुलिस व्यवस्था दी थी, वह दमनात्मक पृठभूमि से ताल्लुक रखती थी. 1857 में लड़े गए पहले स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को लगा कि ऐसा पुलिस बल चाहिए जिसे सिर्फ आदेशों का पालन करना हो.

 

अंग्रेजों ने पुलिस व्यवस्था के लिए अपने जो आरंभिक विचार रखे थे, उनके तहत एक ऐसे पुलिस बल का गठन करना था जो राजनीतिक नजरिए से उपयोगी हो. इसके बाद 1861 का अधिनियम बना.   इस अधिनियम के तहत ऐसे पुलिस बल का गठन किया गया जो सत्ता के हर आदेश का अक्षरश: पालन करे. हमने आजादी मिलने के बाद भारतीय पुलिस सेवा का गठन किया, लेकिन इसका चरित्र आजाद देश के अनुकूल नहीं था. पुलिस बल का ढांचा अंग्रेजों के बनाए ढांचे की तरह ही था. शुरू में अगर दिक्कत हुई होती तो शायद हमारे शुरुआती नेताओं ने इसमें सुधार कर लिया होता, लेकिन आजादी मिलने के बाद हम नए उत्साह और ईमानदारी के साथ देश निर्माण में लगे थे इसलिए सब कुछ ठीकठाक रहा. दिक्कत तब हुई जब अधिकारियों और राजनेताओं में स्वतंत्रता का उन्माद कम होता गया.  

 

राजनीति धीरे-धीरे भ्रष्ट होती गई और पुलिस तंत्र का दुरुपयोग होना चालू हो गया. इसका सबसे भयानक रूप आपातकाल के समय दिखा. शासन के शीर्ष पद पर बैठे लोगों ने इसे निजी सेना के तौर पर लिया. इस दुरुपयोग का पर्दाफाश शाह आयोग ने किया था.

 

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भविष्य में ऐसे दुरुपयोग को रोकने के लिए पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने और उसे देश के कानून और संविधान के प्रति जिम्मेदार बनाने का सुझाव दिया. लेकिन तब तक पुन: कांग्रेस की सरकार बन चुकी थी. रिपोर्ट की बातों की अनदेखी की गई और पुलिस तंत्र ज्यों का त्यों बना रहा. ज्यादातर नेताओं की राय यही थी कि पुलिस प्रशासन में समर्पित लोग ही होने चाहिए. इससे उन्हें फायदा था. खैर ये बातें पुरानी हैं और इसका जिक्र केवल समस्या की गंभीरता को समझने के लिए ही होना चाहिए. हमें देखना तो आगे होगा कि कैसे पुलिस का आधुनिकीकरण हो. पुलिस को स्मार्ट बनाने के लिए प्रत्येक साल गृह मंत्रालय की ओर से पैसे आवंटित किए जाते हैं लेकिन इसका उपयोग सही तरीके से नहीं हो पाता. व्यवस्था ऐसी है कि पुलिस की जवाबदेही सरकार के प्रति होती है, जनता के प्रति नहीं.

 

राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने कहा था कि पुलिस को जनता, कानून और संविधान के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए.   पुलिस आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में राज्यों में सुरक्षा आयोग गठित करने के निर्देश दिए थे. कहा गया कि इस आयोग का स्वरूप ऐसा हो कि सरकारी प्रतिनिधियों का वर्चस्व नहीं हो. आयोग को सुनिश्चित करना था कि राज्य सरकार पुलिस के कामकाज में हस्तक्षेप न करे. कोर्ट के इस आदेश के बाद कई राज्यों में कागज पर आयोग बना दिया गया है लेकिन इसमें सरकार के लोगों की प्रमुखता बनाई रखी गई. सच्चाई यही है कि सरकारों की मंशा ही नहीं है कि पुलिस स्वतंत्र होकर काम करे.   यही कारण है कि पुलिस के पास न संसाधन हैं और न ही ट्रेनिंग की आधुनिक व्यवस्था. यहां तक कि संख्या भी पर्याप्त नहीं.

 

यूएन के अनुसार प्रति एक लाख की आबादी पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, लेकिन हमारे यहां यह औसत 175 है. इसमें भी पांच लाख रिक्तियां हैं. रही ट्रेनिंग की बात तो इसके लिए ऐसे अफसर बहाल किए जाते हैं जिन्हें सरकार अपने लायक नहीं समझती. एक तरह से इसे दंड माना जाता है. ट्रेनिंग देने वाले अफसरों के लिए कोई इंसेंटिव, कोई मोटिवेशन नहीं होता. वे खुद टेक्नोसेवी नहीं होते तो बाकियों को कैसे ऐसा होने की सीख दे पाएंगे? गौर करने वाली बात यह है कि पूर्व सॉलीसीटर जनरल सोली सोराबजी ने 2006 में मॉडल पुलिस एक्ट का प्रारूप रखा था जिसे 2007 में दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू कर दूसरे राज्यों के सामने आदर्श रखने की बात कही गई थी. लेकिन प्रत्यक्षत: कुछ नहीं हुआ. इससे राज्यों को इस मामले में मनमर्जी करने की छूट मिल गई. राज्यों ने अपने मुताबिक पुलिस एक्ट बनाने शुरू कर दिए. अब तक 16 राज्यों ने अपने एक्ट बना लिए हैं.

 

इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन की नहीं बल्कि उसे नजरअंदाज करने की मंशा दिखती है. न तो पुलिस एस्टैब्ल्शिटमेंट बोर्ड का गठन किया गया है और न ही डीजीपी की नियुक्ति की प्रक्रिया तय की गई है. आईजी और एसपी के कार्यकाल के बारे में भी तय नहीं है. पुलिस कर्मियों की शिकायतें सुनने का कोई तंत्र ही नहीं है. नतीतजन हम देख रहे हैं कि अपराध बढ़ रहा है और इससे भी बड़ी बात, लोगों में अपराध के प्रति डर कम हो रहा है.  साफ है कि हालत बहुत खराब है.

 

प्रधानमंत्री को अपना विचार रखने से आगे बढ़ना चाहिए. वे धरातल पर भी प्रयास करें तो अच्छा होगा. पुलिस को राज्य सूची से बाहर निकाल कर समवर्ती सूची में शामिल कर दिया जाए तो यह इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा. केंद्र अगर राज्यों पर दबाव नहीं डालता तो पुलिस सुधार का सपना अभी पूरा नहीं होने वाला. ऐसा नहीं हुआ तो यकीनन राजनीति और अपराध का गठजोड़ भी मजबूत होगा और लोगों की नजरों में पुलिस की अहमियत भी घटेगी.

Back to Top