प्राथमिकता पर आया पूर्वोत्तर

-     यह देश के इतिहास में संभवत: पहली बार हुआ है जब किसी प्रधानमंत्री लगातार तीन दिन पूर्वोत्तर राज्यों में बिताए हों.

 

-     गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिनों पहले पूर्वोत्तर राज्यों की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान कई विकासात्मक योजनाओं का उद्घाटन किया और पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की. इस दौरान उन्होंने भगवा (ऊर्जा) क्रांति लाने की बात की. उन्होंने कहा कि अब सरकार इन राज्यों में विकास के लिए औद्योगिक परियोजनाओं को गति देगी. इससे आठ राज्यों के इस पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास की नई उम्मीद बंधने लगी है. देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी भौगोलिक अवस्थिति, भाषाई विविधता, सांस्कृतिक पहलुओं और प्राकृतिक सुंदरता के लिए सदा से आकर्षण का केंद्र रहा है. आर्थिक क्रियाकलापों की आपाधापी से दूर सरल, शांत आर्थिक व्यवस्था और सबसे बढ़कर हस्तशिल्प की समृद्ध संस्कृति इस क्षेत्र की विशेषता रही है. -     परंतु उदासीनता और कुछ  अन्य खामियों की वजह से इस क्षेत्र, खासकर ग्रामीण इलाकों का विकास अपेक्षानुरूप नहीं हो पाया है. अरु णाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, असम और सिक्किम- इन आठ राज्यों को मिलाकर बना पूर्वोत्तर क्षेत्र 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है. एक लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा और एक संकरी पट्टी, जिसे आम तौर पर चिकेन नेक के नाम से जाना जाता है, के द्वारा यह क्षेत्र शेष भारत से जुड़ा है. यह न केवल आर्थिक विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, वरन संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र होने की वजह से इसका सामरिक व रणनीतिक महत्व भी है.

 

-     इसके व्यापक महत्व को देखते हुए ही भारत सरकार का ध्यान इसके विकास की ओर गया. इस क्षेत्र में बहुतायत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित निर्माण उद्योगों की स्थापना के लिए व्यापक प्रयास पहले से ही किए जा रहे हैं. साथ ही इस क्षेत्र में पर्यटन उद्योगों को भी बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है. इस क्षेत्र में आधारभूत संरचनाओं सहित शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन आदि में भी व्यापक निवेश किए जा रहे हैं. भारत सरकार ने इस क्षेत्र में विकास को और अधिक गति देने के लिए 2001 में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय का गठन किया है. इस बार इसके लिए अलग से एक मंत्रालय भी बना दिया गया है.

 

-     हालांकि इस सबके बावजूद कई तरह की भौगोलिक कठिनाइयों की वजह से इस क्षेत्र का समुचित विकास एक कठिन कार्य रहा है. इसके लिए कई मूलभूत जरूरतों और आधारभूत संरचना सुधार की जरूरत भी होगी जिसके ऊपर ध्यान देने की तत्काल आवश्यकता है. इस संदर्भ में संपर्क का महत्वपूर्ण स्थान है. किसी भी क्षेत्र में सड़कों का विकास वहां के समग्र विकास का एक महत्वपूर्ण सूचक होता है. पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी भौगोलिक अवस्थिति के कारण हमेशा से एक बेहतर सड़क संरचना के अभाव से ग्रस्त रहा है. पूर्वोत्तर में सड़क नेटवर्क को देखें तो यहां कुल सड़क नेटवर्क की लंबाई करीब 82 हजार किमी है. चूंकि यह क्षेत्र पहाड़ी है और यहां बस्तियां दूर-दूर तक फैली है, इस कारण यहां सड़क परिवहन का विकास एक चुनौती से कम नहीं है. कुछ विद्यमान चुनौतियों को चिह्नित कर उनको दूर करने के प्रभावी उपाय करने की जरूरत है.

 

-     पूर्वोत्तर में रेल परिवहन के लिए भी काफी चुनौतियां हैं. कितने ही प्रयासों के बावजूद आज तक यहां संपूर्ण रेल परिवहन का विकास संभव नहीं हो सका है. देश के कुल रेल नेटवर्क का यहां केवल चार फीसद ही मौजूद है. आवश्यकता इस बात की है, जैसा कि विश्व बैंक की 2006 में आई एक रिपोर्ट में भी बताया गया है, कि रेल नेटवर्क को परिवहन के अन्य साधनों के विकास के साथ जोड़ा जाना चाहिए. अब भी यहां छोटी रेल लाइनों की उपस्थिति बड़ी लाइनों की अपेक्षा अधिक है जिन्हें विकसित किया जाना जरूरी है. इस क्षेत्र में रेल परिवहन का विकास सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है. दुर्गम अवस्थिति के कारण इस क्षेत्र में परिवहन का सबसे उपयुक्त माध्यम विमान सेवाएं ही हैं. 

 

-     पूर्वोत्तर में भौतिक आधारभूत संरचनाओं की कमी है. इस स्थिति में संप्रेषण के माध्यम के रूप में दूरसंचार की भूमिका बढ़ जाती है. देश के अन्य भागों की तुलना में यहां दूरसंचार सुविधाएं काफी कम हैं. मोबाइल सेवाएं यहां 2003 में आई थीं. सीमावर्ती क्षेत्र होने की वजह से सुरक्षा की दृष्टि से इस सेवा के साथ कई असुविधाजनक शत्रे जुड़ी होने के कारण भी इसके विकास में बाधा आई है. इंटरनेट सेवा की बात की जाए तो यहां इंटरनेट कनेक्शन पूरे देश का महज एक प्रतिशत ही है. 

 

-     पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल विद्युत की अपार संभावनाएं हैं. एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब 62 हजार मेगावाट तक बिजली पैदा की जा सकती है. आज बिजली उत्पादन की अपार संभावनाओं के बावजूद पूर्वोतर के लगभग सभी राज्य बिजली की कमी से ग्रस्त हैं. बिजली की कमी का सर्वाधिक प्रभाव यहां के ग्रामीण इलाकों में देखा जा सकता है. इससे क्षेत्र के आर्थिक विकास में भी बाधा पहुंच रही है. सरकार इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है. जरूरत इस बात की है कि हम एक दीर्घकालीन नीति पर आगे बढ़ें. यहां की प्राकृतिक सुलभता का लाभ उठाकर बिना अधिक संसाधनों का क्षय किए अधिकतम विद्युत उत्पादन किया जा सकता है.

 

-     पूर्वोत्तर क्षेत्र की अर्थव्यवस्था कृषि पर प्रमुख रूप से आधारित है. अत: इस क्षेत्र में उद्यम की संभावना अधिक है. ग्रामीण क्षेत्र में पर्याप्त श्रम बल और संसाधन मौजूद हैं, जिनमें कृषि, बागवानी, वनोत्पाद, रबड़, चाय, औषधीय पौधे, तेल आदि प्रमुख हैं. इस क्षेत्र में लघु उद्योग और कुटीर उद्योग के विकास की पर्याप्त संभावना छिपी हुई है. कुछ मूलभूत सुविधाओं के विकास के साथ ही कुशल श्रम बल तैयार करके हम इस दिशा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं. फिलहाल पूर्वोत्तर क्षेत्र के सभी राज्यों के उद्योग व व्यापार निदेशालय अपने राज्यों में उद्यमिता व उद्यम के प्रति बेहतर कार्य कर रहे हैं.

 

-     अब जरूरत है कि यहां के युवाओं को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए तथा आधारभूत संरचनाओं के  विकास पर अधिक निवेश किया जाए. क्षेत्र का आर्थिक विकास करने व ग्रामीण आबादी को स्वरोजगार देने सहित क्षेत्र के निम्न आय वर्ग व वंचित समूहों के सशक्तीकरण में लघु व कुटीर उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इस क्षेत्र में पर्यटन उद्योग के विकसित होने के लिए भी पर्याप्त संभावनाएं हैं. कहा जा सकता है कि अपार संभावनाओं से भरा यह क्षेत्र कुछ भौगोलिक व अन्य कारणों से विकास के लक्ष्यों से दूर है. आवश्यकता इस बात की है कि बेहतर कार्य नीतियों व समन्वित नियोजन के साथ इस क्षेत्र का विकास तय किया जाए. ऐसा करने पर समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र की तरक्की हो सकती है.  

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