अब नजरें पेरिस पर

- जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्याओं को सुलझाने के मकसद से पेरू की राजधानी लीमा में 1 से 12 दिसंबर तक अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया गया। पेरू राज्य पुरानी सभ्यताओं का केंद्र रहा है। माना जाता है कि यहां सतासी पुरानी सभ्यताओं का इतिहास छिपा हुआ है। इसके शहर कुस्को, माचू-पिच्चू इन सभ्यताओं के प्रतीक बने हुए हैं। माचू-पिच्चू को खोया हुआ शहर कहा और पवित्र स्थानों में गिना जाता है। यहां प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है। इस मंदिर में ऐसा स्थान बना हुआ है, जहां पर 21 जून को एक विशिष्ट स्थान पर सूर्य की किरणें पहुंचती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उस जमाने में भी वहां के लोग खगोल विज्ञान में दक्ष थे। यह भव्य स्थल है। पवित्रता कण-कण में व्याप्त है।

 

- यह सभी जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते मानव जाति के रहन-सहन, उसके खानपान, पर्यावरण, मौसम, उसकी आय और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। वातावरण, पीने का पानी और खाद्य पदार्थ, सब दूषित हो चुके हैं। अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 2020 तक 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे और सन 2050 तक यह संख्या 13.2 करोड़ हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन के चलते हर साल तीन लाख लोगों की मृत्यु हो रही है और 32.5 करोड़ लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। इन्हें स्थापित करने के लिए प्रतिवर्ष 125 अरब डॉलर की आवश्यकता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय कोश में अभी तक पंद्रह अरब डॉलर भी जमा नहीं हुए हैं। अगर भारत की स्थितियों पर नजर डालें तो यहां सभी ऋतुओं में भारी परिवर्तन आया है। कृषि की उपज लगातार कम हो रही है। कहीं अधिक वर्षा की वजह से परेशानियां खड़ी हो जाती हैं, तो कहीं अकाल की स्थिति बनी रहती है। हर साल समुद्र की सतह एक से दो मिलीमीटर बढ़ रही है और अनुमान है कि इसके चलते समुद्र के किनारे रहने वाले देश के करीब तीस करोड़ लोगों पर बुरा असर पड़ेगा। हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां पिघल रही हैं और इसकी वजह से कहीं पीने के पानी की समस्या पैदा हो रही है तो कहीं मामूली बरसात में भी बाढ़ की स्थिति बन जाती है। सन 2100 तक समुद्र की सतह के इक्कीस फुट तक बढ़ने का अनुमान है। इसके चलते कई देश जलमग्न हो जाएंगे।  

 

-     क्योतो प्रोटोकाल विकसित देशों के बीच हुआ था। तब सभी ने मिल कर यह संकल्प लिया था कि वैश्विक ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में अस्सी प्रतिशत तक कटौती करके उन्हें 1990 के स्तर पर लाया जाएगा और सन 2050 तक कटौती का यह लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। यह भी घोषणा की गई कि जिन देशों में उद्योगीकरण हो चुका है, वे सन 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन में बीस प्रतिशत की कमी लाएंगे। पर ये देश संधि का पालन करने से भाग रहे हैं। अब वे नई संधि, वह भी बिना बाध्यता के, करने को उत्सुक हैं। भारत से एनजीओ बियांड कोपेनहेगन, पैरवी, सिकोयडिकोन, कनसा, सादेश ने आवाज उठाई है कि संधि की बाध्यता लागू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण की स्थापना की जाए और कृषि को महत्त्व दिया जाए।  

 

-      इसमें जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र में पैदा हुए संकट को लेकर विशद चर्चा की गई और यह प्रस्ताव पारित किया गया कि किसानों की समस्याओं को खासतौर पर कॉप-20 की वार्ता में स्थान दिया जाए। पेरू जलवायु सम्मेलन पर पूरे संसार की आशाएं टिकी हुई थीं। उम्मीद की जा रही थी कि अगले साल जो बैठक होगी, वहां जलवायु परिवर्तन को लेकर नया अंतरराष्ट्रीय प्रारूप पारित किया जाएगा। इस वार्ता का आधार यही था कि सभी पक्षों को समझौते की ओर एक मेज पर लाया जा सके, ताकि पेरिस में होने वाले सम्मेलन में एक नया प्रारूप तैयार किया जाए।  

 

अमेरिका और चीन ने कॉप-20 से पहले ही कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए एकपक्षीय घोषणाएं कर दी थी। चीन ने घोषणा की थी कि वह सन 2020 से कार्बन उत्सर्जन में चालीस प्रतिशत की कटौती शुरू करेगा और वह भी उसे 2005 के स्तर पर ले आएगा। अमेरिका ने घोषणा की कि वह वर्ष 2025 तक अपने कार्बन उत्सर्जन में छब्बीस से अट्ठाईस प्रतिशत की कटौती करके उसे सन 2005 के स्तर पर ले आएगा। चीन का उत्सर्जन 2030 में चरम पर पहुंचेगा।   एक ओर उक्त घोषणाओं को आधार मान कर कई देश अपनी तरफ से घोषणाएं करने की बात कर रहे थे, तो दूसरी ओर कुछ देश इन एकतरफा घोषणाओं को विनाशकारी घटना की संज्ञा दे रहे थे। भारत का उत्सर्जन चीन की अपेक्षा बहुत कम है, इसलिए भारत का यह भी कहना था कि सन 2040 तक उसको उत्सर्जन स्तर में कटौती करने की जरूरत नहीं है। पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्तर और दक्षिण का एक गंभीर विवाद उत्पन्न हो चुका था। दक्षिण का उत्तर के प्रति विद्रोह था। दक्षिण के देशों का कहना था कि उत्तर ने समस्याएं पैदा की हैं और उन समस्याओं के निदान के लिए दक्षिण को उसका मूल्य चुकाना पड़ रहा है।

 

  यों सन 1997 में ही जब क्योतो प्रोटोकोल बना था और यह विचार बन चुका था कि विकसित देश ही जलवायु परिवर्तन के दोषी हैं और उनका कर्तव्य है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएं और अन्य वे देश, जो जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन में कोई योगदान नहीं है, उन्हें भी तकनीकी सहायता दें। ऐसे में यह तर्क दिया जा रहा था कि विकासशील देशों पर इसके लिए दबाव क्यों बनाया जा रहा है। चीन, भारत और अन्य विकासशील देश, जो विकास की ओर गतिशील हैं, उन्हें बिजली की आवश्यकता है, ताकि वे अपना विकास कर सकें। इसलिए उनका कहना था कि उनकी उन्नति के लिए विकास आवश्यक है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जो बात उभर कर आई, वह यह कि विकासशील देश भी खुद अपने विवेक से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए घोषणाएं करें। इस प्रकार अलग-अलग देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण थे। प्रयत्न यही था कि किस प्रकार साम्यता के साथ समभाव और समन्वय पैदा किया जाए।  

 

वार्ता के दौरान अमेरिका ने भी कार्बन उत्सर्जन के संबंध में नई घोषणा की कि वह 2025 तक बारह से चौदह प्रतिशत की कटौती करके कार्बन उत्सर्जन का स्तर 1990 के स्तर पर लाएगा। वार्ता में यूरोपीय संघ और सिविल सोसाइटियों ने यह मुख्य आधार प्रस्तुत किया कि एकपक्षीय घोषणा की बाबत दूसरे देशों को घोषणा करने वाले देश के उत्सर्जन की कमी की समीक्षा करने का अधिकार होना चाहिए; पर भारत की ओर से इस विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने विरोध किया कि उनका देश बाहरी पुनरीक्षण का कोई औचित्य स्वीकार नहीं करता, क्योंकि निस्तारण में कमी की घोषणा राष्ट्रीय घोषणा है। चीन और अन्य विकासशील देशों का भी यही विचार है।  

 

इस संबंध में अमेरिका और यूरोपीय संघ में भी मतभेद बने रहे। जहां यूरोपीय संघ समीक्षा के पक्ष में था वहीं अमेरिका एक बीच का रास्ता अपनाने की वकालत करता रहा। उसका कहना था कि प्रत्येक देश की घोषणा स्वविवेक से है, इसलिए अन्य देशों को ऐसी ही घोषणायें करने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है। भारत का कहना था कि स्वविवेक की घोषणा में ही न्यूनीकरण, अनुकूलन, आर्थिक और तकनीकी सहायता का भाव शामिल होना चाहिए। भारत के दृष्टिकोण का विरोध सिविल सोसाइटीज और रिसर्च ग्रुप कर रहे थे, जिनका कहना था कि स्वविवेक की घोषणा की समीक्षा आवश्यक है; क्योंकि इसी के कारण स्वभाव, समरसता और सौम्यता (इक्विटी) का भाव शामिल किया जा सकता है। भारत ने अपना पक्ष रखते हुए अपने प्रयत्नों की घोषणा में स्पष्ट किया कि वह राष्ट्रीय क्लीन एनर्जी कोश में वृद्धि करेगा और बीस हजार मेगावाट सौर ऊर्जा की वृद्धि के लक्ष्य को एक लाख मेगावाट तक पहुंचाएगा और सौ अरब डॉलर खर्च करकार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन में 16.5 करोड़ टन की कमी लाएगा।  

 

-     लीमा में 14 दिसंबर को सम्मेलन के अंतिम क्षणों में लगभग एक सौ नब्बे सदस्य राष्ट्रों के बीच एक वैश्विक समझौता हुआ, जिसमें भारत की अच्छी भूमिका रही। इसके अनुसार विकसित और विकासशील देशों में बीच यह तय हुआ कि सभी देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अपनी-अपनी राष्ट्रीय योजना 31 मार्च, 2015 तक प्रस्तुत कर देंगे, जिनके आधार पर पेरिस में होने वाले अगले वार्षिक सम्मेलन में एक नया वैश्विक समझौता किया जा सकेगा। समझौते के अनुसार यह विचार व्यक्त किया गया है कि क्योतो प्रोटोकॉल की भावना और अनुशीलनता के उपयोगों पर उचित महत्त्व दिया जाएगा। गौरतलब है कि पेरिस में जो समझौता होगा वह 2020 से प्रभावकारी होगा।  

 

-     इस विषय पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गरमागरम बहस हुई कि जलवायु परिवर्तन के इतने गंभीर परिणामों के लिए कौन जिम्मेदार है? क्योतो प्रोटोकॉल में स्पष्ट उल्लेख है कि विकसित देश ही अस्सी प्रतिशत इसके लिए उत्तरदायी हैं। पर्यावरण को लेकर जो भयावह परिस्थिति विश्व में मानव सभ्यता के लिए एक विकराल चुनौती बन चुकी है, इसका समाधान तो ढूंढ़ना ही होगा। धरती को बचाना होगा।  

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