पर्यावरण और वन मामलों पर एक कानून की जरूरत:सुब्रमण्यन समिति

- पर्यावरण और वन मामलों पर पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन की अध्यक्षता वाली समिति ने अनुशंसा की है कि पर्यावरण और वन संबंधी मामलों के एक दूसरे से जुड़े मसलों के प्रशासन से संबंधित तमाम मौजूदा संस्थानों को एक कानून के दायरे में लाया जाए। 

 

- यह भी सुझाव दिया कि एक अधिकारप्राप्त नियामकीय संस्था को एक नया कानून लागू करना चाहिए।

 

- प्रस्तावित व्यापक विधेयक का नाम पर्यावरण (प्रबंधन) कानून रखा जाए और इसमें पर्यावरण, वन और वन्य जीवन से संबंधित मौजूदा कानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों को शामिल किया जाना चाहिए। इन प्रावधानों में जल एवं वायु प्रदूषण भी शामिल हैं।

 

- वहीं 15 सदस्यों वाले नए राष्ट्रीय पर्यावरण प्रबंधन प्राधिकार (नेमा) और उसकी समकक्ष राज्य इकाइयां (सेमा) से उम्मीद की जाती है कि वे मौजूदा केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सर्वोच्च न्यायालय की पर्यावरण और प्रदूषण पर केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति को अन्य मौजूदा संस्थानों को अपने में समाहित कर लेंगी। 

 

- वन अधिकार अधिनियम में भी संशोधन की बात कही जा रही है ताकि स्थानीय समुदायों की मंजूरी के प्रावधानों को शिथिल किया जा सके जो आमतौर पर खनन तथा अन्य परियोजनाओं के रुकने की वजह बनते हैं।

 

- इन सुझावों में से अनेक सही दिशा में हैं। फिलहाल देश दोहरे बोझ से जूझ रहा है। पर्यावरण संबंधी कानूनों की भरमार है और उनका प्रवर्तन सही ढंग से नहीं होता। वे एक दूसरे का अतिक्रमण करते हैं और विरोधाभासी भी हैं। वे बेहतर से बेहतर कंपनी को भी अपराधी बना देते हैं। जब विकास प्राथमिकता बन जाए तो फिर इन अत्यधिक सख्त कानूनों की अनदेखी की जाती है जिसकी कीमत पर्यावरण चुकाता है। समिति के मुताबिक इसका इकलौता जवाब यही है कि एक नया व्यापक कानून तैयार किया जाए जिसका क्रियान्वयन आसान हो।

 

- समिति ने प्रतिस्पर्धी दावों के बीच संतुलन कायम करने की बात कही है। परियोजना की मंजूरी को आसाना बनाया जाना चाहिए लेकिन जैव विविधता वाले घने वनों की रक्षा के लिए बने कानून के सख्त प्रावधानों की समीक्षा जरूरी है। समिति द्वारा कही गई एक अहम बात यह है कि कंपनियों को वनों से जुड़े मानकों की अनुपालना का प्रमाणन खुद से करना चाहिए। ऐसा करने से पुष्टिï करने में लगने वाला समय बच जाएगा। इस संबंध में गलत जानकारी से बचने के लिए दंडात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है।

 

- एक अन्य गंभीर समस्या जिसकी ओर इशारा किया गया है वह है वन की सही परिभाषा। नई परिभाषा में वनों को केवल उन इलाकों तक सीमित कर दिया गया है जो सरकारी रिकॉर्ड में भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत अधिसूचित हैं।

 

- निजी भूमि पर किए गए किसी भी पौधरोपण को इससे बाहर रखा गया है। इस बीच अलग-अलग राज्यों ने वन भूमि को अलग अलग तरह से परिभाषित किया है। इससे भ्रम पैदा हुआ है। प्रतिबंधित क्षेत्र की अवधारणा की बात करें तो वह पुराने स्वरूप का ही संशोधित और शिथिल प्रारूप है। संरक्षित क्षेत्र को घने वन से अलग आरक्षित क्षेत्र, वन्य जीव अभयारण्य और राष्टï्रीय पार्क तक सीमित कर दिया गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण के मुताबिक देश के कुल वन क्षेत्र का केवल 12 फीसदी इस दायरे में आता है।

 

- इन क्षेत्रों में किसी भी विकास संबंधी पहल के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी चाहिए। यकीनन नेमा के गठन समेत समिति की कई अनुशंसाओं में से कई एकदम नई नहीं हैं। लेकिन अतीत में इनको या तो इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि सरकार अपनी प्रभुता कम नहीं करना चाहती थी या फिर उनको बिना किसी प्रगति के विचाराधीन रखा गया था।

 

- अब जबकि ये सारी बातें एक उच्चस्तरीय समिति ने पेश की हैं तो सरकार को इन पर पेशकदमी करनी चाहिए। स्पष्टï कानून अधिक पारदर्शी क्रियान्वयन की वजह बनेंगे। जाहिर है ये सारी बातें पर्यावरण के संरक्षण में मददगार होंगी।  

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