ब्यूरोक्रेसी में सुधार की जरूरत

» देश में एक बार फिर ब्यूरोक्रेसी की सोच और व्यवहार में तब्दीली की बात उठ रही है. हाल में, डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग के निर्देश के मुताबिक गठित किरण अग्रवाल कमेटी ने केंद्र सरकार को आईएएस अफसरों की ट्रेनिंग में कुछ तब्दीलियों की सिफारिश भेजी, जिसे सरकार ने मंजूर कर लिया है. पहले सिविल सेवा परीक्षा में चयनित ट्रेनी आईएएस अफसर को 105 हफ्ते की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होना पड़ता था, जो अब नई सिफारिशों के मुताबिक 75 हफ्तों का रह जाएगा. मौजूदा माहौल में ऐसी तब्दीलियों की काफी जरूरत है क्योंकि जनता के विकास से संबंधित सरकारी योजनाएं लागू करने का सबसे अहम जिम्मा इन्हीं अधिकारियों पर होता है.

 

» आईएसएस अफसरों की ट्रेनिंग और सेवा में कुछ वर्ष या दशक गुजार चुके ब्यूरोक्रेट्स को देश और जनता की नई जरूरतों के हिसाब से प्रशिक्षित करने की पहलकदमियों की जरूरत हाल के वर्षों में समझी गई है. इसकी एक झलक पिछले साल 21 अप्रैल को सिविल सर्विसेज डे के मौके पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस बयान से मिली थी, जिसमें उन्होंने सरकारी योजनाओं का फायदा आम जनता तक पहुंचाने के लिए ब्यूरोक्रेसी में नवाचार (इनोवेशन) की जरूरत पर बल दिया था.   ऐसी ही एक अन्य पहल पिछले साल नागपुर में आयोजित चार दिवसीय ब्यूरोक्रेसी के चिंतन शिविर के रूप में हुई थी जो देश में पहला ऐसा आयोजन था. यह एक तरह का प्रशिक्षण शिविर था, जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों और विभागों के 100 आईएएस अधिकारियों को बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश और टेक्नोलॉजी की नई चुनौतियों के मुताबिक सरकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाने की ट्रेनिंग दी गई थी.

 

» हालांकि लंबे अरसे से मांग की जाती रही है कि देश की ब्यूरोक्रेसी को सोच-विचार का अपना तरीका यानी माइंडसेट यानी बदलना चाहिए. 2010 में इन्फोसिस के संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने भी भारतीय नौकरशाही के स्वरूप में बदलाव की सलाह दी थी.   उन्होंने कहा था कि आईएएस सेवाओं को खत्म कर उसकी जगह इंडियन मैनेजमेंट सर्विस का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को रखा जाए. इस तब्दीली के पीछे प्रमुख दलील यह थी कि भारतीय नौकरशाही का माइंडसेट और ढांचा आज के समय के अनुकूल नहीं रह गया है. आज भी ब्यूरोक्रेसी औपनिवेशिक शासन काल की तरह सोचती और व्यवहार करती है. वह अब भी खुद को शासक मानती है. न तो उसके पास पास काम करने की इच्छाशक्ति है और न कोई दृष्टि. ऊपर से राजनीतिक अवमूल्यन ने उसे भ्रष्ट और निकम्मा बना दिया है. इन वजहों से हमारी ब्यूरोक्रेसी का मौजूदा ढांचा और काम करने के उसके तौर-तरीके देश और जनता की जरूरतों से मेल नहीं खाते हैं. वास्तव में हमारी ब्यूरोक्रेसी  कई तरह की समस्याओं की गिरफ्त में है. वह लापरवाही, सुस्ती और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गई है, इसे साबित किया है समय-समय पर हुए अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों ने जिस कारण देश को शर्मसार होना पड़ता है.

 

» हांगकांग की पॉलिटिकल और इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी ने 2009 में एशिया की 12  सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की नौकरशाही को लेकर किए एक सर्वे में भारतीय ब्यूरोक्रेट्स को सबसे निकम्मा बताया था. उसमें यहां तक कहा गया था कि भारतीय अफसर देश के विकास में सबसे बड़े बाधक हैं.   इसी तरह विश्व आर्थिक फोरम ने 49 देशों के अफसरों के कामकाज का सर्वेक्षण किया था जिसमें भारतीय नौकरशाही को एकदम नीचे 44 वां स्थान दिया गया था. इतना ही नहीं, ब्यूरोक्रेसी में कायम भ्रष्टाचार ने कोढ़ में खाज वाले हालात पैदा किए हैं. अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ब्यूरोक्रेट्स के खिलाफ कई मामले शुरू हुए लेकिन उनमें से ज्यादातर अंजाम तक नहीं पहुंच पाए. ऐसा साजिशन हुआ. बराबर कोशिश की गई कि या तो जांच पूरी ही न हो पाए या फिर दिशाहीन हो जाए.  

 

» इससे जुड़ी समस्या का एक पहलू यह भी है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही उसे लेकर सारा हंगामा राजनेताओं पर केंद्रित कर दिया जाता है. ऐसी स्थिति में सरकार या राजनीतिक पार्टयिां नेताओं को पद छोड़ने जैसे प्रतीकात्मक दंड देकर लोगों का आक्रोश शांत कर देती हैं. इस तरह मामला ही दब जाता है और उसमें शामिल नौकरशाह भी निशाने पर आने से बच जाते हैं. इससे यह आम धारणा बन गई है कि राजनीतिक नेतृत्व अपने हित के लिए ब्यूरोक्रेसी का इस्तेमाल करता है और वही अफसरों को भ्रष्ट बनाता है. पर यह अधूरा सच है. असल में जिस तरह राजनीतिक नेतृत्व ऊंचे पदों पर बैठे ब्यूरोक्रेट्स का अपने लिए इस्तेमाल करता है, उसी तरह ब्यूरोक्रेसी भी अपने लाभ के लिए राजनीतिक संरक्षण हासिल करती है.  

 

» यह बात इससे साबित होती है कि यदि हमारी ब्यूरोक्रेसी ने पूरी ईमानदारी और तटस्थता से भ्रष्टाचार का विरोध किया होता, तो भ्रष्टाचार का मौजूदा स्वरूप नहीं दिखता. यह ब्यूरोक्रेसी में व्याप्त भ्रष्टाचार का नतीजा है कि आज हर योजना में भ्रष्टाचार मौजूद है. कॉमनवेल्थ गेम्स में गड़बड़ी का मामला हो या आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला, 2जी स्कैम हो या कोयला घोटाला-  सभी में ऊंचे ओहदों पर बैठे अफसरों की संदेहास्पद भूमिका रही है. सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा के बारे में सुप्रीम कोर्ट की हालिया राय इसी कड़ी का खुलासा करती है. शायद यही वजह है कि आज ब्यूरोक्रेसी में तब्दीली की कोशिशें हो रही है. पर यह भी सच है कि अब से पहले और आजादी के बाद ज्यादातर सरकारों ने सिविल प्रशासन के ढांचे में बुनियादी बदलाव का साहस नहीं दिखाया.

 

» इस बारे में जो एकाध कोशिशें हुई भी तो नौकरशाहों की मजबूत लॉबी ने बदलाव के प्रयासों को पलीता लगाने में कोर-कसर नहीं छोड़ी. इसी का नतीजा है कि सरकारी प्रशासन और आम जनता में दूरी बनी हुई है और योजनाओं का फायदा जनता को मिलने के बजाय दलालों को मिल रहा है. चूंकि प्रशासन में समाज की कोई भागीदारी नहीं होती, लिहाजा अधिकारी जनता की जरूरतों को भी नहीं समझ पाते हैं.  

 

» एक समस्या यह भी है कि एक ही तरह की परीक्षा पास कर और एक ही तरह की ट्रेनिंग पाने वाले अधिकारियों से अलग-अलग क्षेत्रों में काम लिया जाता है जो पूरी तरह अव्यावहारिक है. इस कारण भी किसी प्रयास का उचित फल नहीं मिल पाता है. इसीलिए आज अलग-अलग क्षेत्रों में काम रहे आईएएस अधिकारियों को उनके क्षेत्र और विशेषज्ञता से जुड़ी ट्रेनिंग की जरूरत है. मौजूदा समय की जरूरतों के मद्देनजर यदि अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी उस क्षेत्र विशेष के जानकार अधिकारी को सौंपी जाएगी तो निश्चित ही कार्य की गुणवत्ता में सुधार आएगा. अब तक ऐसा न हो पाने के कारण ही सरकारी उपक्रम खस्ताहाल हैं, जबकि प्राइवेट कंपनियां लगातार तरक्की कर रही हैं.  

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