भारत और दक्षिण-दक्षिण सहयोग

- दक्षिण-दक्षिण सहयोग में सम्पन्न और वंचित वर्गों के बीच की दूरी पाटने तथा संसाधन, अवसर, और उनके वितरण के संदर्भ में न्याय कर पाने की क्षमता है। जबकि हम उत्तर-दक्षिण सहयोग को हमारे विकास की बुनियाद मानते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उत्तर की ओर से एकजुटता, समझ, सहयोग और वास्तविक भागीदारी बरकरार और सशक्त रहे, लेकिन समय की जरूरत है कि विविधता और दृढ़ विश्वास के साथ नए बाजारों की तलाश की जाए, ताकि विकास संबंधी जरूरते पूरी की जा सकें।

 

=>दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लाभ - बाजार निकटता, उत्पादों और प्रक्रियाओं में समानता तथा कारोबारी संस्कृति के संबंध विकासशील देशों के निवेशकों को व्यापार और निवेश के संबंध में व्यापक अवसरों की पेशकश करते हैं। विश्व व्यापार संगठन के मंत्री-स्तरीय सम्मेलन और दोहा विकास एजेंडे के क्रियान्वयन में लगातार विफलता की वजह से अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक प्रणाली में विकासशील देशों के हितों के बेहतर प्रतिनिधित्व और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए हम देशों के बीच व्यापक एकजुटता की तत्काल जरूरत प्रदर्शित हुई है। 

 

- इस सिलसिले में, हमने अपनी चिंताओं और हितों की व्यापक अभिव्यक्ति की दिशा में वैश्विक मसलों के प्रति अत्याधिक एकता और एकजुटता प्रदर्शित करने का बीड़ा उठाया है। गहरे दक्षिण-दक्षिण सम्पर्क और सहयोग से जलवायु परिवर्तन, संयुक्त राष्ट्र सुधार, वैश्विक वित्तीय संकट से निपटते हुए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार जैसे अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मसलों के प्रति समान रुख तय करने में मदद मिलेगी। इसलिए भारत इस बात की पुनः पुष्टि करता है कि दक्षिण-दक्षिण व्यापार बढ़ाना चाहिए और विकासशील देशों की ओर से बाजार तक पहुंच में वृद्धि से दक्षिण-दक्षिण व्यापार को प्रोत्साहन मिलना जारी रहना चाहिए।

 

उभरती अर्थव्यवस्थाएं एवं दक्षिण-दक्षिण सहयोग - क्षमता निर्माण, कौशल विकास, रोजगार सृजन और रोगों से निपटने की सामूहिक चुनौतियों को संबोधित करने के अवसर मौजूद हैं, जो समावेशी वृद्धि हासिल करने के लिए अनिवार्य हैं। सम्भावित क्षेत्र, जहां विकासशील देश अपने कारोबारी सम्पर्कों और सम्बंधों का विस्तार कर सकते हैं, उनमें विशेष तौर पर खनिज और खनन, कृषि, कृषि आधारित कारोबार और कृषि प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, सड़कों और राजमार्गों सहित निर्माण एवं अभियांत्रिकी, रेलवे, फार्मास्यूटिकल्स, लघु वित्त और छोटे व मझौले उद्योग, वस्त्र, नवीकरणीय ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान आदि शामिल हैं।

 

- विकासशील देश अपनी रचनात्मक क्षमताओं में व्यापक बढ़ोत्तरी करते हुए अब अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वृद्धि का क्षेत्रीय और वैश्विक साधन बन गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय निवेश में भी ऐसा ही स्वरूप उभरकर आया है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) अभूतपूर्व रहा है। वे स्वयं विदेश में पैसा लगाने और विकसित और विकासशील देशों में एफडीआई करने लगे हैं। 

 

- हाल के समय में भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में पनपी लचीलेपन, अल्प लागत एवं उचित प्रौद्योगिकी जैसी विशेषताओं की वजह से, दक्षिण-दक्षिण सहयोग विश्व भर में आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। दक्षिण की बहुत सी अर्थव्यवस्थाएं विशाल हैं लेकिन उनकी प्रति व्यक्ति आय बहुत कम है। वे अपनी क्षमता से कम सहायता दे रही हैं। यह किसी भी तरह उन्हें परम्परागत ओईसीडी (आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन) दानदाताओं के समकक्ष नहीं लाता।

 

-47 अल्प विकसित देशों की जरूरतों के प्रति दक्षिण-दक्षिण सहयोग के महत्व का उल्लेख करने की विशेष जरूरत है, क्योंकि उनमें बीमारी और अभाव का खतरा सबसे अधिक रहता है तथा इन देशों में क्षमता निर्माण की प्रक्रिया दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत ज्यादा प्रभावशाली है। हम विकसित देशों द्वारा विकासशील और अल्पविकसित देशों के प्रति किए जाने वाले भेदभाव और विरोध से अवगत हैं, दक्षिण-दक्षिण वस्तुओं के व्यापार को सीमा शुल्क और गैर शुल्क बाधाओं का सामना करना पड़ता है। 

 

- व्यापारिक क्षमताओं की कमी और उच्च परिवहन लागत की वजह से व्यापार के समक्ष अतिरिक्त बाधा उत्पन्न होती है। पूरे दक्षिण में अलग-अलग सीमा शुल्क दरें कई तरह की हैं और गरीब देशों को उन उच्चतम सीमा शुल्कों का सामना करना पड़ता है। वर्तमान समय में, दक्षिण-दक्षिण व्यापार के समक्ष आने वाली बाधाएं अन्य सहयोगियों के साथ दक्षिणी व्यापार को संचालित करने वालों की तुलना में अधिक हैं और दूरी से सम्बद्ध लागत ऊंची है।

 

"भारत और दक्षिण-दक्षिण सहयोग" - जहां तक भारत का प्रश्न है, वह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को उत्तर-दक्षिण सहयोग के विकल्प के रूप में नहीं अपितु पूरक के रूप में देखता है। हम भारत, ब्राजील दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्‍स) शिखर सम्मेलन और ब्राजील,रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (बीआरआईसीएस) शिखर सम्मेलन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका के साथ बहुपक्षीय रूप से जुड़ रहे हैं। दोनों मंच अंतर-क्षेत्रीय वार्ता और ठोस सहयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं। 

 

- हम इस बात के प्रति सचेत हैं कि ब्रिक-आईबीएसए सभी प्रमुख महाद्वीपों के मुख्य और विविध देशों के बीच जिनमें ब्रिक-एस ए शामिल हैं, वैश्विक मसलों पर करीबी सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने का कारगर माध्यम साबित होंगे। दक्षिण का प्रतिनिधि होने के नाते, यह विकासशील देश की जनता की वैश्विक मंच पर आवाज भी साबित होंगे।

 

- भारत ने व्यापार और निवेश से सम्बद्ध द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौतों, खास तौर पर द्विपक्षीय निवेश संवर्द्धन एवं संरक्षण समझौते (बीआईपीपीए), मुक्त व्यापार समझौते(एफटीए), समग्र आर्थिक सहयोग समझौते, दोहरे कराधान से बचाव समझौतों को अंतिम रूप देने के लिए वार्ता की पहल की है और निष्कर्ष तक पहुंचाया है, जिनसें हमारे व्यापार और निवेश को सही मायनों में बल मिलेगा। 

 

- हम उनके बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), छोटे और मझोले उद्योगों (एसएमई), बाजार तक व्यापक पहुंच और निवेश की सुविधा को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रयासों को सुदृढ़ कर रहे हैं।  - भारत ने स्वच्छ और हरित प्रौद्योगिकियों का रुख करते हुए, ऊर्जा के हरित और अक्षय स्रोतों को विकसित और उनका इस्तेमाल करने की प्रौद्योगिकी बांटकर स्वच्छ और सतत विश्व के प्रति अपनी इच्छा और मंशा का प्रदर्शन किया है।

 

- सरकारी विभागों का परस्पर व्याप्त नेटवर्क तैयार करके, कारोबारी सम्पर्कों और साथ ही साथ सरकार तथा कारोबारियों की संयुक्त पहलों, व्यापार और निवेश से सम्बद्ध मसलों पर मंत्री-स्तरीय संस्थागत संवाद, मौजूदा अंतर-सरकारी तंत्रों को सक्रिय बनाकर, वाणिज्यिक मिशनों के माध्यम से व्यापार सहज बनाकर, उद्यमों के उपलब्ध अवसरों के बारे में सूचनाओं के प्रसार, सामुद्रिक और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में बेहतर सम्पर्कों और साथ ही साथ व्यापार और निवेश सम्बंधों में भारत अपने समक्ष आ रही वैश्विक चुनौतियों से सामूहिक रूप से निपट सकता है।

 

- हम व्यापार, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में साथ काम करने के अवसरों की पहचान करने के लिए व्यापारिक आयोजनों, व्यापारिक सभाओं और व्यापार मेलों तथा प्रदर्शिनियों का आयोजन, एसएमई उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन, अवसंरचना विकास सहित वृहत आधार पर परियोजनाओं में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के विकास जैसे कदमों से व्यापार को प्रोत्साहन देने वाली गतिविधियों में वृद्धि करते हुए कारोबारी सम्पर्क बढ़ा रहे हैं। आने वाले समय में निश्चित तौर पर यह फायदेमंद साबित होगा।

 

- उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए यह जरूरी है कि विविध मंचों पर समान दृष्टिकोण बनाने के लिए सहक्रियाशीलता बढ़ाए और वैश्विक व्यापार में तेज गति सुनिश्चित करे, जो निष्पक्ष, पारदर्शी और मुक्त हो। इसलिए वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में दक्षिण-दक्षिण आर्थिक भागीदारी अनिवार्य और आवश्यक है, जिसके लिए प्रयास किए जाने की जरूरत है।

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