चीन के बढ़ते ग्लोबल प्रभाव से भारत को मिलेगी चुनौती

- चीन का बाजार धीरे-धीरे दुनिया में फैलता जा रहा है। अमेरिका से लेकर दुनिया के कई देशों में चीन में बना सामान प्रयोग किया जाता है। भारत भी इसमें शामिल है। चीन के इस बढ़ते प्रभुत्‍व को लेकर मीडिया में भी जोर-शोर से चर्चा हो रही है। फाइनेंशियल टाइम्स ने भी इसकी घोषणा की है कि मौजूदा साल 2014 में अमेरिका को पीछे छोड़कर चीन, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगा। हालांकि, जिन आधारों पर यह घोषणा की गई है उन पर सवालिया निशान लगाए जा सकते हैं। फिर भी चीन के इस तरह बढ़ते जाने का दुनिया के लिए और खासतौर पर भारत के लिए बहुत महत्व है। क्‍योंकि भारत को चीन के इस बढ़ते प्रभुत्‍व से विश्‍व स्‍तर पर अपनी भूमिका को लेकर सक्रियता से साेचना पड़ेगा। अभी भारत की सारी कूटनीतिक ताकत अपने घरेलू मुद्दों का निपटान करने में चली जाती है। लेकिन अब उसे अपनी सारी ताकत और क्षमता का इस्‍तेमाल विदेशों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने की दिशा में लगाने के बारे में सोचना होगा। इस तथ्य से सामना करने की चुनौती हाल में भारत की सत्‍ता पर काबिज हुई नई सरकार की प्राथमिकताओं में भी शामिल होगी। यह अनुमान खरीद क्षमता के आधार पर लगाया गया है।

 

मसलन, एक अमेरिकी डॉलर 6.25 चीनी येन औैर 60.16 भारतीय रुपए के बराबर है। बेशक, 60 रुपए भारत में आपको जो दे सकते हैं वह उससे ज्यादा होगा, जो न्यूयॉर्क में एक डॉलर आपको दे सकता है। इसी खरीद क्षमता के आधार पर पिछले साल भारत ने जापान को वैश्विक आर्थिक रैंकिंग में पीछे छोड़ दिया था। भारत का जीडीपी अब 5.07 खरब डॉलर है तो जापान का 4.7 खरब डॉलर। इसके मुताबिक अमेरिका 16.8 खरब डॉलर के साथ शीर्ष पर तो चीन 13.4 खरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है। यदि आप विनिमय दर के अनुसार जीडीपी की गणना करें तो दूसरा ही चित्र उभरता है। इसमें अमेरिका व चीन तो अपने स्थान पर जमे रहते हैं पर भारत 10वें स्थान पर खिसक जाता है। फाइनेंशियल टाइम्स का कहना है कि आईएमएफ की उम्मीद के मुताबिक चीन 2011 से 2014 के बीच 24 फीसदी की वृद्धि देखेगा जबकि इसी दौरान अमेरिका की आर्थिक वृद्धि सिर्फ 7.2 फीसदी होगी।

 

हालांकि, दूसरी दृष्टि से देखें तो चीन नंबर वन और भारत नंबर तीन अर्थव्यवस्था होने के बाद भी न तो दुनिया में प्रदूषण रोकने के लिए कुछ कर रहे हैं, न अपने देशवासियों को मकान दे पा रहे हैं, न उन्हें सूदखोरों से बचा पा रहे हैं। चीन और भारत में बड़ी आबादी गरीबों की रह रही है। प्रति व्यक्ति जीडीपी के हिसाब से चीन 93वें नंबर पर और भारत 133वें स्थान पर है। चीन कई आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है पर 7.5 फीसदी की आर्थिक वृद्धि का जुनून उस पर ऐसा चढ़ा है कि वह निर्यात पर गैर-जरूरी निर्भरता की ओर ध्यान देकर आर्थिक सुधार करने को राजी ही नहीं है। प्रदूषण को कम करने के लिए भी कुछ नहीं कर रहा।

 

अमेरिका की नाकामी की दुनिया को भारी कीमत चुकानी होगी। बेशक, अमेरिका भी कई देशों को धमकाता रहा है और भारत को इसका काफी अनुभव है पर चीन की तुलना में उसकी नीतियों में खुलापन और उदारता है। अभी हम चीन के नेतृत्व वाली दुनिया की दहलीज पर नहीं पहुंचे हैं पर दुनिया बदल रही है।

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